हीरामन और हीराबाई की प्रेम कहानी याद है न आप को! जी हाँ... वही राजकपूर वहीदा रहमान वाली ... मतलब 'तीसरी क़सम' वाली ... अरे मतलब वही... फणीश्वर नाथ रेणु की 'मारे गए गुल्फ़ाम' वाली अमर प्रेम कहानी।
उसमें सबसे बेहतरीन गीत जो मुझे पसंद है... दुनिया बनाने वाले. क्या तेरे मन में समायी... , उसी गीत की सैर कराने आप को ले चल रहा हूँ।
ऐसी ही भोली भाली कहानियां सुसुप्त और दबी हुई पशे-पर्दा अनेक कहानियों को मंज़र-ए-आम पर लाने का काम करती हैं। जब हीरामन की बैल गाड़ी में हीराबाई 30 घंटे का सफ़र तय कर रही होती है तो उसके साथ-साथ कई लोक कथाओं और लोकोक्तियों के साथ लाखों पाकीज़ा रुहें भी साथ-साथ सफ़र कर रही होती हैं।
पढिए उस दिलफरेब संवाद, दिलकश मंज़रकशी और उम्दा शायरी के तवस्सुत से 'तीसरी क़सम' के सारांश को ...
दुनिया बनाने वाले.. क्या तेरे मन में समाई... गाने में तब बासु भट्टाचार्य, फणीश्वर नाथ रेणु, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की बेहतरीन कोशिशों ने धमाल मचाया था।
जब साथी गीतकार शैलेन्द्र ने निर्माता के तौर पर फ़िल्म "तीसरी क़सम" बनाई, तब उन्होंने हसरत जयपुरी को फिल्म के गीत लिखने के लिए आमंत्रित किया। इस गीत में हसरत जयपुरी ने इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-मिज़ाजी का जो ख़ाका पेश किया उसने पत्थर दिल लोगों को भी पिघला कर रख दिया। इस गाने के एक-एक लाइनों पर पत्थरों का कलेजा भी धड़क उठता है।
हालांकि फिल्म उस समय असफल साबित हुई थी जिसके ग़म से गीतकार-निर्माता शैलेन्द्र उबर नही पाए और इस जहान-ए-फ़ानी से कूच कर गए। लेकिन ये गीत उस दौर में भी अमर हुआ इस दौर में भी अमर है और आगे भी यक़ीनन अमर रहेगा। मैंने स्क्रीन शॉट्स के ज़रिये इस गाने और क्लाईमेक्स के कुछ भोले भाले लम्हात चुराकर लगाए हैं, उन्हें भी ग़ौर से देखने की ज़रूरत है।
आईए चलते हैं...
संवाद...
हीरामन (राजकपूर) घाट की तरफ़ ईशारा करते हुए हीराबाई (वहीदा रहमान) से कहता है -
"वो जो महुआ घटवारन का घाट है न, उसी मुल्क की थी महुआ। थी तो घटवारन लेकिन सौ सतवंती में एक। उसका बाप दिन दिहाड़े ताड़ी पीकर बेहोश रहता था। उसकी सौतेली मां थी साक्षात राक्षसिन। महुआ कुंवारी थी। भरी पूरी दुनिया में उसका कोई न था।"
गीत....
दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी
*(हीराबाई हाथ पर हाथ धरे बड़े ग़ौर से हीरामन की बातें और गीत सुनती है।)
संवाद...
हीरामन (राजकपूर) -" कैसे करुँ महुआ के रूप का बखान! हिरनी जैसी कजरारी आंखें। चांद सा चमकता चेहरा। एड़ी तक लंबे रेशमी बाल। जब वो मुस्कुराती तो जैसे बिजली कौंध जाती। भगवान जी ही ऐसा रूप भर सकते हैं माटी के पुतले में।"
*(ये संवाद सुनकर हीराबाई को अपनी बेइंतहा ख़ूबसूरती का ख़्याल आता है जिसपर वो लजाकर छुई-मुई हो जाती है।) उफ़्फ़...
गीत....
काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला
गुप-चुप तमाशा देखे
वाह रे तेरी ख़ुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी
दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी
संवाद...
हीरामन (राजकपूर) - "जवान हो गई थी महुआ। फिर भी कहीं शादी ब्याह की बात नहीं हुई थी। सुबह शाम वो अपनी मरी मां को याद करके रोती। रात दिन कलप्ता था बेचारी का मन। मन समझती हैं न आप!"
*(जब भोला-भाला हीरामन, ये सवाल करता है कि "मन समझती हैं न आप!" तो हीराबाई भी उसी भोलेपन से 'हां' में सर हिलाती है) उफ़्फ़...
गीत...
तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसूं भी छलके होंगे पलकों से तेरी
बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी
दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी
*(तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर,
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर... कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी... इस लाइन पर हीराबाई भावविभोर होकर बेचैनी के आलम में उठ खड़ी होती है।) उफ़्फ़...
संवाद...
हीरामन (राजकपूर) - " एक दिन एक थका प्यासा मुसाफ़िर नदी किनारे पानी पीने आया। महुआ को देखते ही उसपर रीझ गया। नादान महुआ भी उसको दिल दे बैठी। जंगल के आग की तरह गांव में फैल गई थी प्यार की बात। सौतेली मां भला कैसे देख सकती थी उनका सुख। उसने महुआ को एक सौदागर के हाथ बेच दिया। रोती छटपटाटी महुआ चली गई सौदागर के साथ। बिछड़ गई जोड़ी... महुआ का प्रेमी जैसे... आज भी रोता है।"
गीत...
प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए
सपने जगा के तुने
काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी..
*बासु भट्टाचार्य ने इस पुरे गाने में, बल्कि पुरी फिल्म में राजकपूर को गमछा, ऊरेबी कुर्ता, धोती और गले में तावीज़ डालकर रेणु के देहाती हीरामन को 'मारे गए गुल्फ़ाम' से निकाल कर सिल्वर स्क्रीन पर बख़ूबी उतार दिया था।
*ग़मगीन माहौल और भींगते जज़्बात के बीच-बीच में नदी की ख़ामोश लहरों में अचानक तलातुम पैदा होकर किनारे पर जब आ छलकता है तो आंसूओं का सैलाब जैसा नज़र आता है। बासु भट्टाचार्य का निर्देशन तो कमाल का है ही लेकिन बिना राजकपूर के मशविरे के ऐसे सीन बनना ग़ैर यक़ीनी बात है।
अब आख़िर में क्लाइमैक्स का वो सीन जब हीराबाई अपने हीरामन को ज़मींदार के कोप से बचाने के लिए फिर से नौटंकी को ही अपना पेशा बनाए रखने पर आमादा होती है और गांव छोड़कर दूसरे शहर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने जाती है। हीरामन भागा-भागा स्टेशन पर हीराबाई से मिलने जाता है।
वहां हीराबाई अपने मीता (हीरामन) को उसकी रखी हुई अमानत लौटाती है और अपना शॉल उसे उपहार स्वरूप देते हुए कहती है 'सर्दी में काम आएगी।' हीराबाई की ज़ुबान बोलने में लड़खड़ा रही है फिर भी कलेजे पर पत्थर रखकर बोले जा रही है और हीरामन चुपचाप टुकुर-टुकुर उसका चेहरा निहारता रहता है। गाड़ी सीटी देती है। हीराबाई खिड़की पर बैठी अपने हीरामन को एकटक निहारती रहती है और गाड़ी चल पड़ती है। हीरामन चुपचाप उसे विदा होते देखता रहता है।
जब हीरामन मन मारकर अपनी बैलगाड़ी पर वापस लौटता है और गाड़ी बढ़ाने के लिए बैल पर चाबुक उठाता है तो पीछे से आवाज़ आती है "मारो मत"। गाड़ी तो ख़ाली होती है। मतलब ये हीरामन के तख़य्युल से आती हुई हीराबाई की आवाज़ होती है। फिर हीरामन बैलों को डांटते हुए कहता है "उलट-उलट के क्या देखते हो! खाओ क़सम! अब किसी कंपनी की बाई को गाड़ी में नहीं बैठाएंगे।"
उसे क्या मालूम कि उसकी हीराबाई उसकी ही सलामती की ख़ातिर अपनी क़ुर्बानी देकर यहां से चली गई...
उफ़्फ़... ये लेखक लोग दिलों का हाल बता कर आख़िर रुलाते क्यूँ हैं!!!
अब क़दम रखते हैं दौर-ए-हाज़िर में और सवाल करते हैं कि क्या वैसे हिदायतकार फ़नकार इस दौर में हैं जो सीमित संसाधनों और बिना आधुनिक तकनीक के वैसी कालजयी फिल्में बना सकते हैं!
दूसरा सवाल क्या 'मारे गए गुलफ़ाम/तीसरी क़सम' के किरदारों जैसे सीधे-सादे भोले-भाले, प्रेम में जीने और प्रेम को निभाने वाले लोग हैं इस दौर में!
तीसरा सवाल यह कि क्या ऐसे शाहकार नग़्मे और फिल्में इस नफ़रत भरी दुनिया में मुहब्बत का पैग़ाम देने में कामयाब हो पाते हैं!

