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Wednesday, December 15, 2021

तीसरी कसम

हीरामन और हीराबाई की प्रेम कहानी याद है न आप को! जी हाँ... वही राजकपूर वहीदा रहमान वाली ... मतलब 'तीसरी क़सम' वाली ... अरे मतलब वही... फणीश्वर नाथ रेणु की 'मारे गए गुल्फ़ाम' वाली अमर प्रेम कहानी। 

उसमें सबसे बेहतरीन गीत जो मुझे पसंद है... दुनिया बनाने वाले. क्या तेरे मन में समायी... , उसी गीत की सैर कराने आप को ले चल रहा हूँ। 

ऐसी ही भोली भाली कहानियां सुसुप्त और दबी हुई पशे-पर्दा अनेक कहानियों को मंज़र-ए-आम पर लाने का काम करती हैं। जब हीरामन की बैल गाड़ी में हीराबाई 30 घंटे का सफ़र तय कर रही होती है तो उसके साथ-साथ कई लोक कथाओं और लोकोक्तियों के साथ लाखों पाकीज़ा रुहें भी साथ-साथ सफ़र कर रही होती हैं। 

पढिए उस दिलफरेब संवाद, दिलकश मंज़रकशी और उम्दा शायरी के तवस्सुत से 'तीसरी क़सम' के सारांश को ...
दुनिया बनाने वाले.. क्या तेरे मन में समाई... गाने में तब बासु भट्टाचार्य, फणीश्वर नाथ रेणु, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की बेहतरीन कोशिशों ने धमाल मचाया था। 

जब साथी गीतकार शैलेन्द्र ने निर्माता के तौर पर फ़िल्म "तीसरी क़सम" बनाई, तब उन्होंने हसरत जयपुरी को फिल्म के गीत लिखने के लिए आमंत्रित किया। इस गीत में हसरत जयपुरी ने इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-मिज़ाजी का जो ख़ाका पेश किया उसने पत्थर दिल लोगों को भी पिघला कर रख दिया। इस गाने के एक-एक लाइनों पर पत्थरों का कलेजा भी धड़क उठता है। 

हालांकि फिल्म उस समय असफल साबित हुई थी जिसके ग़म से गीतकार-निर्माता शैलेन्द्र उबर नही पाए और इस जहान-ए-फ़ानी से कूच कर गए। लेकिन ये गीत उस दौर में भी अमर हुआ इस दौर में भी अमर है और आगे भी यक़ीनन अमर रहेगा। मैंने स्क्रीन शॉट्स के ज़रिये इस गाने और क्लाईमेक्स के कुछ भोले भाले लम्हात चुराकर लगाए हैं, उन्हें भी ग़ौर से देखने की ज़रूरत है। 
आईए चलते हैं... 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) घाट की तरफ़ ईशारा करते हुए हीराबाई (वहीदा रहमान) से कहता है - 

"वो जो महुआ घटवारन का घाट है न, उसी मुल्क की थी महुआ। थी तो घटवारन लेकिन सौ सतवंती में एक। उसका बाप दिन दिहाड़े ताड़ी पीकर बेहोश रहता था। उसकी सौतेली मां थी साक्षात राक्षसिन। महुआ कुंवारी थी। भरी पूरी दुनिया में उसका कोई न था।" 

गीत.... 

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

*(हीराबाई हाथ पर हाथ धरे बड़े ग़ौर से हीरामन की बातें और गीत सुनती है।) 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) -" कैसे करुँ महुआ के रूप का बखान! हिरनी जैसी कजरारी आंखें। चांद सा चमकता चेहरा। एड़ी तक लंबे रेशमी बाल। जब वो मुस्कुराती तो जैसे बिजली कौंध जाती। भगवान जी ही ऐसा रूप भर सकते हैं माटी के पुतले में।" 

*(ये संवाद सुनकर हीराबाई को अपनी बेइंतहा ख़ूबसूरती का ख़्याल आता है जिसपर वो लजाकर छुई-मुई हो जाती है।) उफ़्फ़... 

गीत.... 

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला

गुप-चुप तमाशा देखे
वाह रे तेरी ख़ुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) - "जवान हो गई थी महुआ। फिर भी कहीं शादी ब्याह की बात नहीं हुई थी। सुबह शाम वो अपनी मरी मां को याद करके रोती। रात दिन कलप्ता था बेचारी का मन। मन समझती हैं न आप!" 

*(जब भोला-भाला हीरामन, ये सवाल करता है कि "मन समझती हैं न आप!" तो हीराबाई भी उसी भोलेपन से 'हां' में सर हिलाती है) उफ़्फ़... 

गीत... 

तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसूं भी छलके होंगे पलकों से तेरी

बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी

*(तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर, 
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर... कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी... इस लाइन पर हीराबाई भावविभोर होकर बेचैनी के आलम में उठ खड़ी होती है।) उफ़्फ़... 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) - " एक दिन एक थका प्यासा मुसाफ़िर नदी किनारे पानी पीने आया। महुआ को देखते ही उसपर रीझ गया। नादान  महुआ भी उसको दिल दे बैठी। जंगल के आग की तरह गांव में फैल गई थी प्यार की बात। सौतेली मां भला कैसे देख सकती थी उनका सुख। उसने महुआ को एक सौदागर के हाथ बेच दिया। रोती छटपटाटी महुआ चली गई सौदागर के साथ। बिछड़ गई जोड़ी... महुआ का प्रेमी जैसे... आज भी रोता है।"

गीत... 

प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए

सपने जगा के तुने 
काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी..

*बासु भट्टाचार्य ने इस पुरे गाने में, बल्कि पुरी फिल्म में राजकपूर को गमछा, ऊरेबी कुर्ता, धोती और गले में  तावीज़ डालकर रेणु के देहाती हीरामन को 'मारे गए गुल्फ़ाम' से निकाल कर सिल्वर स्क्रीन पर बख़ूबी उतार दिया था।

*ग़मगीन माहौल और भींगते जज़्बात के बीच-बीच में नदी की ख़ामोश लहरों में अचानक तलातुम पैदा होकर किनारे पर जब आ छलकता है तो आंसूओं का सैलाब जैसा नज़र आता है। बासु भट्टाचार्य का निर्देशन तो कमाल का है ही लेकिन बिना राजकपूर के मशविरे के ऐसे सीन बनना ग़ैर यक़ीनी बात है।

अब आख़िर में क्लाइमैक्स का वो सीन जब हीराबाई अपने हीरामन को ज़मींदार के कोप से बचाने के लिए फिर से नौटंकी को ही अपना पेशा बनाए रखने पर आमादा होती है और गांव छोड़कर दूसरे शहर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने जाती है। हीरामन भागा-भागा स्टेशन पर हीराबाई से मिलने जाता है। 

वहां हीराबाई अपने मीता (हीरामन) को उसकी रखी हुई अमानत लौटाती है और अपना शॉल उसे उपहार स्वरूप देते हुए कहती है 'सर्दी में काम आएगी।' हीराबाई की ज़ुबान बोलने में लड़खड़ा रही है फिर भी कलेजे पर पत्थर रखकर बोले जा रही है और हीरामन चुपचाप टुकुर-टुकुर उसका चेहरा निहारता रहता है। गाड़ी सीटी देती है। हीराबाई खिड़की पर बैठी अपने हीरामन को एकटक निहारती रहती है और गाड़ी चल पड़ती है। हीरामन चुपचाप उसे विदा होते देखता रहता है। 

जब हीरामन मन मारकर अपनी बैलगाड़ी पर वापस लौटता है और गाड़ी बढ़ाने के लिए बैल पर चाबुक उठाता है तो पीछे से आवाज़ आती है "मारो मत"। गाड़ी तो ख़ाली होती है। मतलब ये हीरामन के तख़य्युल से आती हुई हीराबाई की आवाज़ होती है। फिर हीरामन बैलों को डांटते हुए कहता है "उलट-उलट के क्या देखते हो! खाओ क़सम! अब किसी कंपनी की बाई को गाड़ी में नहीं बैठाएंगे।" 

उसे क्या मालूम कि उसकी हीराबाई उसकी ही सलामती की ख़ातिर अपनी क़ुर्बानी देकर यहां से चली गई... 

उफ़्फ़... ये लेखक लोग दिलों का हाल बता कर आख़िर रुलाते क्यूँ हैं!!! 

अब क़दम रखते हैं दौर-ए-हाज़िर में और सवाल करते हैं कि क्या वैसे हिदायतकार फ़नकार इस दौर में हैं जो सीमित संसाधनों और बिना आधुनिक तकनीक के वैसी कालजयी फिल्में बना सकते हैं!

दूसरा सवाल क्या 'मारे गए गुलफ़ाम/तीसरी क़सम' के किरदारों जैसे सीधे-सादे भोले-भाले, प्रेम में जीने और प्रेम को निभाने वाले लोग हैं इस दौर में!

तीसरा सवाल यह कि क्या ऐसे शाहकार नग़्मे और फिल्में इस नफ़रत भरी दुनिया में मुहब्बत का पैग़ाम देने में कामयाब हो पाते हैं!

लेखक : Abdul Gaffar

एक किरदार एक कलाकार कन्हैयालाल 1

कन्हैया लाल पुरानी हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। इनकी प्रसिद्ध फ़िल्मों में मदर इण्डिया शामिल है।
हिंदी सिनेमा के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो अब तक ना जाने कितने कलाकार आए और चले गए...कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप...कुछ कलाकारों ने फिल्मों में बड़े-बड़े किरदार निभाए लेकिन वो नाम नहीं कमा पाए जो आज याद किया जाए...लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने किरदार तो छोटे-मोटे निभाए लेकिन उनका नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया...ऐसे ही एक कलाकार थे कन्हैया लाल...हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्म मदर इंडिया का लालची और धूर्त लाला तो याद होगा...जी हां इस किरदार को अमर बनाने वाले कन्हैया लाल ही थे...

जन्मदिन अवसर विनम्र अभिवादन🙏🌹

एक किरदार एक कलाकार कन्हैयालाल 1

कन्हैया लाल पुरानी हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। इनकी प्रसिद्ध फ़िल्मों में मदर इण्डिया शामिल है।
हिंदी सिनेमा के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो अब तक ना जाने कितने कलाकार आए और चले गए...कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप...कुछ कलाकारों ने फिल्मों में बड़े-बड़े किरदार निभाए लेकिन वो नाम नहीं कमा पाए जो आज याद किया जाए...लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने किरदार तो छोटे-मोटे निभाए लेकिन उनका नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया...ऐसे ही एक कलाकार थे कन्हैया लाल...हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्म मदर इंडिया का लालची और धूर्त लाला तो याद होगा...जी हां इस किरदार को अमर बनाने वाले कन्हैया लाल ही थे...

जन्मदिन अवसर विनम्र अभिवादन🙏🌹

विवेकानन्द जी

एक बार एक साधु जैसे दिखने वाले सज्जन रेल से कहीं सफ़र कर रहे थे | जिस डिब्बे में वे सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे |

उन अंग्रेजो को साधुओं से बहुत चिढ़ थी | वे साधुओं की लगातार ख़ूब निंदा कर रहे थे | साथ वाले साधु यात्री को भी गाली दे रहे थे | उन अंग्रेजों की सोच थी कि चूँकि साधू अंग्रेजी नहीं जानते, इसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ रहे होंगे | इसलिए उन अंग्रेजो ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला बुरा कहा |

हालांकि उन दिनों की हकीकत भी यही थी कि अंग्रेजी जानने वाले साधु होते भी नहीं थे |

रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया | उस स्टेशन पर उन सज्जन के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे, जिनमे विद्वान् एवं कुछ बड़े अधिकारी भी थे |

वहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर वे सज्जन फर्राटेदार अंग्रेजी में ही दे रहे थे |

 इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते देखकर उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया जो रेल में अबतक उनकी बुराई कर रहे थे |

अवसर मिलने पर वे उन सज्जन के पास आए और उनसे नम्रतापूर्वक पूछा – आपने हम लोगों की बात सुनी, आपने बहुत बुरा माना होगा ?

वे सज्जन बहुत ही सहज शालीनता से बोले....” मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना अधिक व्यस्त था कि मैंने आप लोगों की बातें बिलकुल सुनी ही नहीं औऱ न ही उन पर ध्यान दे सका ,इसलिए मुझें बुरा मानने का अवसर ही नहीं मिला..... |” 

उन सज्जन का यह जवाब सुनकर अंग्रेजो का सिर शर्म से झुक गया और वे उनके चरणों में गिर पड़े......वे सज्जन कोई औऱ नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद जी थे.....!!

राज कपूर नूतन

दिलीप राज कुमार

यंग वैजयंती

15 12

kapoor sisters

Tuesday, December 14, 2021

पुरुषार्थ

"पुरुषार्थ"
      तस्वीर भारत विभाजन के समय की है। इतिहास के किसी दस्तावेज में यह दर्ज नहीं कि पुरुष के कंधे पर बैठी यह स्त्री उसकी पत्नी है, बहन है, बेटी है, या कौन है। बस इतना स्पष्ट है कि एक पुरुष और एक स्त्री मृत्यु के भय से भाग रहे हैं। भाग रहे हैं अपना घर छोड़ कर, अपनी मातृभूमि छोड़ कर, अपनी संस्कृति व अपनी जड़ों को छोड़ कर...
      तस्वीर यह भी नहीं बता पा रही कि दोनों भारत से पाकिस्तान की ओर भाग रहे हैं या पाकिस्तान से भारत की ओर भाग रहे हैं। मैं परिधान तथा दाढ़ी से अंदाजा लगाता हूँ तो लगता है कि सिक्ख हैं, और यदि सिक्ख हैं तो पाकिस्तान से भारत की ओर ही भाग रहे हैं। तस्वीर बस इतना बता रही है कि दोनों भाग रहे हैं, मृत्यु से जीवन की ओर... अंधकार से प्रकाश की ओर... 
"तमसो माँ ज्योतिर्गमय" का साक्षात रूप...
 
      अद्भुत है यह तस्वीर। जब देखता हूँ तब रौंगटे खड़े हो जाते हैं। क्या नहीं है इस तस्वीर में? दुख, भय, करुणा, त्याग, मोह, और शौर्य भी... मनुष्य के हृदय में उपजने वाले सारे भाव हैं इस अकेली तस्वीर में।
   
    पर मैं कहूँ कि यह तस्वीर पुरुषार्थ की सबसे सुंदर तस्वीर है तो तनिक भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक पुरुष के कंधे का इससे बड़ा सम्मान और कुछ नहीं हो सकता, कि विपत्ति के क्षणों में वह एक स्त्री का अवलम्ब बने।
    
    आप कह नहीं सकते कि अपना घर छोड़ कर भागता यह बुजुर्ग कितने दिनों का भूखा होगा। सम्भव है भूखा न भी हो, और सम्भव है कि दो दिन से कुछ न खा पाया हो। पर यह आत्मविश्वास कि "मैं इस स्त्री को अपने कंधे पर बिठा कर इस नर्क से स्वर्ग तक कि यात्रा कर सकता हूँ" ही पुरुषार्थ कहलाता है शायद। पुरुष का घमंड यदि इस रूप में उभरे कि "मैं एक स्त्री से अधिक कष्ट सह सकता हूँ, या मेरे होते हुए एक स्त्री को कष्ट नहीं होना चाहिए" तो वह घमंड सृष्टि का सबसे सुंदर घमंड है। 
हाँ जी! घमंड सदैव नकारात्मक ही नहीं होता।
    
    मुझे लगता है कि स्त्री जब अपने सबसे सुंदर रूप में होती है तो 'माँ' होती है, और पुरुष जब अपनी पूरी गरिमा के साथ खड़ा होता है तो 'पिता' होता है। 

    अपने कंधे पर एक स्त्री को बैठा कर चलते इस पुरुष का उस स्त्री के साथ चाहे जो सम्बन्ध हो, पर उस समय उस स्त्री को इसमें अपना पिता ही दिखा होगा। नहीं तो वह उसके कंधे पर चढ़ नहीं पाती।   

कंधे पर तो पिता ही बैठाता है, और बदले में एक बार पुत्र के कंधे पर चढ़ना चाहता है। और वह भी मात्र इसलिए, कि पुत्र असंख्य बार कंधे पर चढ़ने के ऋण से मुक्त हो सके।   
  
    ऋणी को स्वयं बहाना ढूंढ कर मुक्त करने वाले का नाम पिता है, और मुक्त होने का भाव पुत्र... यह शायद मानवीय सम्बन्धो का सबसे सुन्दर सत्य है।
   
    इतिहास को यह भी स्मरण नहीं कि मृत्यु के भय से भागता यह युगल जीवन के द्वार तक पहुँच सका या राह में ही कुछ नरभक्षी इन्हें लील गए, पर वर्तमान को यह ज्ञात है कि सवा अरब की जनसँख्या वाले इस देश मे यदि ऐसे हजार कंधे भी हों तो वे देश को मृत्यु से जीवन की ओर ढो ले जाएंगे।
      
ईश्वर! 
मेरे देश को वैसी परिस्थिति मत देना, पर वैसे कंधे अवश्य देना ताकि देश जी सके, और जी सके पुरुषों की प्रतिष्ठा। 

ताकि नारीवाद के समक्ष जब मेरा पुरुषवाद खड़ा हो तो पूरे गर्व के साथ मुस्कुराए और कहे ...
'अहम ब्रह्मास्मि....'