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Wednesday, December 15, 2021

तीसरी कसम

हीरामन और हीराबाई की प्रेम कहानी याद है न आप को! जी हाँ... वही राजकपूर वहीदा रहमान वाली ... मतलब 'तीसरी क़सम' वाली ... अरे मतलब वही... फणीश्वर नाथ रेणु की 'मारे गए गुल्फ़ाम' वाली अमर प्रेम कहानी। 

उसमें सबसे बेहतरीन गीत जो मुझे पसंद है... दुनिया बनाने वाले. क्या तेरे मन में समायी... , उसी गीत की सैर कराने आप को ले चल रहा हूँ। 

ऐसी ही भोली भाली कहानियां सुसुप्त और दबी हुई पशे-पर्दा अनेक कहानियों को मंज़र-ए-आम पर लाने का काम करती हैं। जब हीरामन की बैल गाड़ी में हीराबाई 30 घंटे का सफ़र तय कर रही होती है तो उसके साथ-साथ कई लोक कथाओं और लोकोक्तियों के साथ लाखों पाकीज़ा रुहें भी साथ-साथ सफ़र कर रही होती हैं। 

पढिए उस दिलफरेब संवाद, दिलकश मंज़रकशी और उम्दा शायरी के तवस्सुत से 'तीसरी क़सम' के सारांश को ...
दुनिया बनाने वाले.. क्या तेरे मन में समाई... गाने में तब बासु भट्टाचार्य, फणीश्वर नाथ रेणु, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन की बेहतरीन कोशिशों ने धमाल मचाया था। 

जब साथी गीतकार शैलेन्द्र ने निर्माता के तौर पर फ़िल्म "तीसरी क़सम" बनाई, तब उन्होंने हसरत जयपुरी को फिल्म के गीत लिखने के लिए आमंत्रित किया। इस गीत में हसरत जयपुरी ने इश्क़-ए-हक़ीक़ी और इश्क़-ए-मिज़ाजी का जो ख़ाका पेश किया उसने पत्थर दिल लोगों को भी पिघला कर रख दिया। इस गाने के एक-एक लाइनों पर पत्थरों का कलेजा भी धड़क उठता है। 

हालांकि फिल्म उस समय असफल साबित हुई थी जिसके ग़म से गीतकार-निर्माता शैलेन्द्र उबर नही पाए और इस जहान-ए-फ़ानी से कूच कर गए। लेकिन ये गीत उस दौर में भी अमर हुआ इस दौर में भी अमर है और आगे भी यक़ीनन अमर रहेगा। मैंने स्क्रीन शॉट्स के ज़रिये इस गाने और क्लाईमेक्स के कुछ भोले भाले लम्हात चुराकर लगाए हैं, उन्हें भी ग़ौर से देखने की ज़रूरत है। 
आईए चलते हैं... 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) घाट की तरफ़ ईशारा करते हुए हीराबाई (वहीदा रहमान) से कहता है - 

"वो जो महुआ घटवारन का घाट है न, उसी मुल्क की थी महुआ। थी तो घटवारन लेकिन सौ सतवंती में एक। उसका बाप दिन दिहाड़े ताड़ी पीकर बेहोश रहता था। उसकी सौतेली मां थी साक्षात राक्षसिन। महुआ कुंवारी थी। भरी पूरी दुनिया में उसका कोई न था।" 

गीत.... 

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

*(हीराबाई हाथ पर हाथ धरे बड़े ग़ौर से हीरामन की बातें और गीत सुनती है।) 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) -" कैसे करुँ महुआ के रूप का बखान! हिरनी जैसी कजरारी आंखें। चांद सा चमकता चेहरा। एड़ी तक लंबे रेशमी बाल। जब वो मुस्कुराती तो जैसे बिजली कौंध जाती। भगवान जी ही ऐसा रूप भर सकते हैं माटी के पुतले में।" 

*(ये संवाद सुनकर हीराबाई को अपनी बेइंतहा ख़ूबसूरती का ख़्याल आता है जिसपर वो लजाकर छुई-मुई हो जाती है।) उफ़्फ़... 

गीत.... 

काहे बनाये तूने माटी के पुतले
धरती ये प्यारी प्यारी मुखड़े ये उजले
काहे बनाया तूने दुनिया का खेला
जिसमें लगाया जवानी का मेला

गुप-चुप तमाशा देखे
वाह रे तेरी ख़ुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) - "जवान हो गई थी महुआ। फिर भी कहीं शादी ब्याह की बात नहीं हुई थी। सुबह शाम वो अपनी मरी मां को याद करके रोती। रात दिन कलप्ता था बेचारी का मन। मन समझती हैं न आप!" 

*(जब भोला-भाला हीरामन, ये सवाल करता है कि "मन समझती हैं न आप!" तो हीराबाई भी उसी भोलेपन से 'हां' में सर हिलाती है) उफ़्फ़... 

गीत... 

तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी
आंसूं भी छलके होंगे पलकों से तेरी

बोल क्या सूझी तुझको
काहे को प्रीत जगाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी

दुनिया बनाने वाले
क्या तेरे मन में समाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने काहे को दुनिया बनायी

*(तू भी तो तङपा होगा मन को बना कर, 
तूफां ये प्यार का मन में छुपा कर... कोई छवि तो होगी आँखों में तेरी... इस लाइन पर हीराबाई भावविभोर होकर बेचैनी के आलम में उठ खड़ी होती है।) उफ़्फ़... 

संवाद... 

हीरामन (राजकपूर) - " एक दिन एक थका प्यासा मुसाफ़िर नदी किनारे पानी पीने आया। महुआ को देखते ही उसपर रीझ गया। नादान  महुआ भी उसको दिल दे बैठी। जंगल के आग की तरह गांव में फैल गई थी प्यार की बात। सौतेली मां भला कैसे देख सकती थी उनका सुख। उसने महुआ को एक सौदागर के हाथ बेच दिया। रोती छटपटाटी महुआ चली गई सौदागर के साथ। बिछड़ गई जोड़ी... महुआ का प्रेमी जैसे... आज भी रोता है।"

गीत... 

प्रीत बनाके तूने जीना सिखाया
हँसना सिखाया, रोना सिखाया
जीवन के पथ पर मीत मिलाये
मीत मिला के तूने सपने जगाए

सपने जगा के तुने 
काहे को दे दी जुदाई
काहे को दुनिया बनायी
तुने... काहे को दुनिया बनायी..

*बासु भट्टाचार्य ने इस पुरे गाने में, बल्कि पुरी फिल्म में राजकपूर को गमछा, ऊरेबी कुर्ता, धोती और गले में  तावीज़ डालकर रेणु के देहाती हीरामन को 'मारे गए गुल्फ़ाम' से निकाल कर सिल्वर स्क्रीन पर बख़ूबी उतार दिया था।

*ग़मगीन माहौल और भींगते जज़्बात के बीच-बीच में नदी की ख़ामोश लहरों में अचानक तलातुम पैदा होकर किनारे पर जब आ छलकता है तो आंसूओं का सैलाब जैसा नज़र आता है। बासु भट्टाचार्य का निर्देशन तो कमाल का है ही लेकिन बिना राजकपूर के मशविरे के ऐसे सीन बनना ग़ैर यक़ीनी बात है।

अब आख़िर में क्लाइमैक्स का वो सीन जब हीराबाई अपने हीरामन को ज़मींदार के कोप से बचाने के लिए फिर से नौटंकी को ही अपना पेशा बनाए रखने पर आमादा होती है और गांव छोड़कर दूसरे शहर जाने के लिए ट्रेन पकड़ने जाती है। हीरामन भागा-भागा स्टेशन पर हीराबाई से मिलने जाता है। 

वहां हीराबाई अपने मीता (हीरामन) को उसकी रखी हुई अमानत लौटाती है और अपना शॉल उसे उपहार स्वरूप देते हुए कहती है 'सर्दी में काम आएगी।' हीराबाई की ज़ुबान बोलने में लड़खड़ा रही है फिर भी कलेजे पर पत्थर रखकर बोले जा रही है और हीरामन चुपचाप टुकुर-टुकुर उसका चेहरा निहारता रहता है। गाड़ी सीटी देती है। हीराबाई खिड़की पर बैठी अपने हीरामन को एकटक निहारती रहती है और गाड़ी चल पड़ती है। हीरामन चुपचाप उसे विदा होते देखता रहता है। 

जब हीरामन मन मारकर अपनी बैलगाड़ी पर वापस लौटता है और गाड़ी बढ़ाने के लिए बैल पर चाबुक उठाता है तो पीछे से आवाज़ आती है "मारो मत"। गाड़ी तो ख़ाली होती है। मतलब ये हीरामन के तख़य्युल से आती हुई हीराबाई की आवाज़ होती है। फिर हीरामन बैलों को डांटते हुए कहता है "उलट-उलट के क्या देखते हो! खाओ क़सम! अब किसी कंपनी की बाई को गाड़ी में नहीं बैठाएंगे।" 

उसे क्या मालूम कि उसकी हीराबाई उसकी ही सलामती की ख़ातिर अपनी क़ुर्बानी देकर यहां से चली गई... 

उफ़्फ़... ये लेखक लोग दिलों का हाल बता कर आख़िर रुलाते क्यूँ हैं!!! 

अब क़दम रखते हैं दौर-ए-हाज़िर में और सवाल करते हैं कि क्या वैसे हिदायतकार फ़नकार इस दौर में हैं जो सीमित संसाधनों और बिना आधुनिक तकनीक के वैसी कालजयी फिल्में बना सकते हैं!

दूसरा सवाल क्या 'मारे गए गुलफ़ाम/तीसरी क़सम' के किरदारों जैसे सीधे-सादे भोले-भाले, प्रेम में जीने और प्रेम को निभाने वाले लोग हैं इस दौर में!

तीसरा सवाल यह कि क्या ऐसे शाहकार नग़्मे और फिल्में इस नफ़रत भरी दुनिया में मुहब्बत का पैग़ाम देने में कामयाब हो पाते हैं!

लेखक : Abdul Gaffar

एक किरदार एक कलाकार कन्हैयालाल 1

कन्हैया लाल पुरानी हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। इनकी प्रसिद्ध फ़िल्मों में मदर इण्डिया शामिल है।
हिंदी सिनेमा के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो अब तक ना जाने कितने कलाकार आए और चले गए...कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप...कुछ कलाकारों ने फिल्मों में बड़े-बड़े किरदार निभाए लेकिन वो नाम नहीं कमा पाए जो आज याद किया जाए...लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने किरदार तो छोटे-मोटे निभाए लेकिन उनका नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया...ऐसे ही एक कलाकार थे कन्हैया लाल...हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्म मदर इंडिया का लालची और धूर्त लाला तो याद होगा...जी हां इस किरदार को अमर बनाने वाले कन्हैया लाल ही थे...

जन्मदिन अवसर विनम्र अभिवादन🙏🌹

एक किरदार एक कलाकार कन्हैयालाल 1

कन्हैया लाल पुरानी हिन्दी फ़िल्मों के एक प्रसिद्ध अभिनेता थे। इनकी प्रसिद्ध फ़िल्मों में मदर इण्डिया शामिल है।
हिंदी सिनेमा के इतिहास के पन्नों को पलटकर देखें तो अब तक ना जाने कितने कलाकार आए और चले गए...कुछ हिट हुए तो कुछ फ्लॉप...कुछ कलाकारों ने फिल्मों में बड़े-बड़े किरदार निभाए लेकिन वो नाम नहीं कमा पाए जो आज याद किया जाए...लेकिन कुछ कलाकार ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने किरदार तो छोटे-मोटे निभाए लेकिन उनका नाम हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा-हमेशा के लिए दर्ज हो गया...ऐसे ही एक कलाकार थे कन्हैया लाल...हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्म मदर इंडिया का लालची और धूर्त लाला तो याद होगा...जी हां इस किरदार को अमर बनाने वाले कन्हैया लाल ही थे...

जन्मदिन अवसर विनम्र अभिवादन🙏🌹

विवेकानन्द जी

एक बार एक साधु जैसे दिखने वाले सज्जन रेल से कहीं सफ़र कर रहे थे | जिस डिब्बे में वे सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे |

उन अंग्रेजो को साधुओं से बहुत चिढ़ थी | वे साधुओं की लगातार ख़ूब निंदा कर रहे थे | साथ वाले साधु यात्री को भी गाली दे रहे थे | उन अंग्रेजों की सोच थी कि चूँकि साधू अंग्रेजी नहीं जानते, इसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ रहे होंगे | इसलिए उन अंग्रेजो ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला बुरा कहा |

हालांकि उन दिनों की हकीकत भी यही थी कि अंग्रेजी जानने वाले साधु होते भी नहीं थे |

रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया | उस स्टेशन पर उन सज्जन के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे, जिनमे विद्वान् एवं कुछ बड़े अधिकारी भी थे |

वहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर वे सज्जन फर्राटेदार अंग्रेजी में ही दे रहे थे |

 इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते देखकर उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया जो रेल में अबतक उनकी बुराई कर रहे थे |

अवसर मिलने पर वे उन सज्जन के पास आए और उनसे नम्रतापूर्वक पूछा – आपने हम लोगों की बात सुनी, आपने बहुत बुरा माना होगा ?

वे सज्जन बहुत ही सहज शालीनता से बोले....” मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना अधिक व्यस्त था कि मैंने आप लोगों की बातें बिलकुल सुनी ही नहीं औऱ न ही उन पर ध्यान दे सका ,इसलिए मुझें बुरा मानने का अवसर ही नहीं मिला..... |” 

उन सज्जन का यह जवाब सुनकर अंग्रेजो का सिर शर्म से झुक गया और वे उनके चरणों में गिर पड़े......वे सज्जन कोई औऱ नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद जी थे.....!!

राज कपूर नूतन

दिलीप राज कुमार

यंग वैजयंती

15 12

kapoor sisters

Tuesday, December 14, 2021

पुरुषार्थ

"पुरुषार्थ"
      तस्वीर भारत विभाजन के समय की है। इतिहास के किसी दस्तावेज में यह दर्ज नहीं कि पुरुष के कंधे पर बैठी यह स्त्री उसकी पत्नी है, बहन है, बेटी है, या कौन है। बस इतना स्पष्ट है कि एक पुरुष और एक स्त्री मृत्यु के भय से भाग रहे हैं। भाग रहे हैं अपना घर छोड़ कर, अपनी मातृभूमि छोड़ कर, अपनी संस्कृति व अपनी जड़ों को छोड़ कर...
      तस्वीर यह भी नहीं बता पा रही कि दोनों भारत से पाकिस्तान की ओर भाग रहे हैं या पाकिस्तान से भारत की ओर भाग रहे हैं। मैं परिधान तथा दाढ़ी से अंदाजा लगाता हूँ तो लगता है कि सिक्ख हैं, और यदि सिक्ख हैं तो पाकिस्तान से भारत की ओर ही भाग रहे हैं। तस्वीर बस इतना बता रही है कि दोनों भाग रहे हैं, मृत्यु से जीवन की ओर... अंधकार से प्रकाश की ओर... 
"तमसो माँ ज्योतिर्गमय" का साक्षात रूप...
 
      अद्भुत है यह तस्वीर। जब देखता हूँ तब रौंगटे खड़े हो जाते हैं। क्या नहीं है इस तस्वीर में? दुख, भय, करुणा, त्याग, मोह, और शौर्य भी... मनुष्य के हृदय में उपजने वाले सारे भाव हैं इस अकेली तस्वीर में।
   
    पर मैं कहूँ कि यह तस्वीर पुरुषार्थ की सबसे सुंदर तस्वीर है तो तनिक भी अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक पुरुष के कंधे का इससे बड़ा सम्मान और कुछ नहीं हो सकता, कि विपत्ति के क्षणों में वह एक स्त्री का अवलम्ब बने।
    
    आप कह नहीं सकते कि अपना घर छोड़ कर भागता यह बुजुर्ग कितने दिनों का भूखा होगा। सम्भव है भूखा न भी हो, और सम्भव है कि दो दिन से कुछ न खा पाया हो। पर यह आत्मविश्वास कि "मैं इस स्त्री को अपने कंधे पर बिठा कर इस नर्क से स्वर्ग तक कि यात्रा कर सकता हूँ" ही पुरुषार्थ कहलाता है शायद। पुरुष का घमंड यदि इस रूप में उभरे कि "मैं एक स्त्री से अधिक कष्ट सह सकता हूँ, या मेरे होते हुए एक स्त्री को कष्ट नहीं होना चाहिए" तो वह घमंड सृष्टि का सबसे सुंदर घमंड है। 
हाँ जी! घमंड सदैव नकारात्मक ही नहीं होता।
    
    मुझे लगता है कि स्त्री जब अपने सबसे सुंदर रूप में होती है तो 'माँ' होती है, और पुरुष जब अपनी पूरी गरिमा के साथ खड़ा होता है तो 'पिता' होता है। 

    अपने कंधे पर एक स्त्री को बैठा कर चलते इस पुरुष का उस स्त्री के साथ चाहे जो सम्बन्ध हो, पर उस समय उस स्त्री को इसमें अपना पिता ही दिखा होगा। नहीं तो वह उसके कंधे पर चढ़ नहीं पाती।   

कंधे पर तो पिता ही बैठाता है, और बदले में एक बार पुत्र के कंधे पर चढ़ना चाहता है। और वह भी मात्र इसलिए, कि पुत्र असंख्य बार कंधे पर चढ़ने के ऋण से मुक्त हो सके।   
  
    ऋणी को स्वयं बहाना ढूंढ कर मुक्त करने वाले का नाम पिता है, और मुक्त होने का भाव पुत्र... यह शायद मानवीय सम्बन्धो का सबसे सुन्दर सत्य है।
   
    इतिहास को यह भी स्मरण नहीं कि मृत्यु के भय से भागता यह युगल जीवन के द्वार तक पहुँच सका या राह में ही कुछ नरभक्षी इन्हें लील गए, पर वर्तमान को यह ज्ञात है कि सवा अरब की जनसँख्या वाले इस देश मे यदि ऐसे हजार कंधे भी हों तो वे देश को मृत्यु से जीवन की ओर ढो ले जाएंगे।
      
ईश्वर! 
मेरे देश को वैसी परिस्थिति मत देना, पर वैसे कंधे अवश्य देना ताकि देश जी सके, और जी सके पुरुषों की प्रतिष्ठा। 

ताकि नारीवाद के समक्ष जब मेरा पुरुषवाद खड़ा हो तो पूरे गर्व के साथ मुस्कुराए और कहे ...
'अहम ब्रह्मास्मि....'

Monday, November 1, 2021

पिज़्ज़ा वाला

एक बार एक कारखाने में एक आदमी चुपचाप खड़ा था, कोई काम नहीं कर रहा था और बिना किसी मकसद के इधर-उधर देख रहा था जबकि बाक़ी लोग अपने काम में लगे हुए थे. उस समय कारखाने के नये सीईओ की जब नज़र उस पर पड़ी तो उसने पास आकर सबसे पहले उसका वेतन पूछा. आदमी ने जवाब दिया 5000 रू महीना सर. सीईओ ने अपना बटुआ निकाला और उसे तुरंत 15000 रू दिया और उससे कहा मैं यहाँ सिर्फ़ लोगों को काम करने के लिए भुगतान करता हूँ और समय बर्बाद करने के लिए नहीं. यह 3 महीने का वेतन है, अब यहाँ से बाहर निकल जाओ और फिर कभी वापस मत आना, वह आदमी तुरंत चला गया. फिर सीईओ ने बेहद गुस्से में श्रमिकों से पूछा वह कामचोर आदमी कौन था? श्रमिकों ने जवाब दिया पिज्जा डिलीवरी बॉय, सर वो यहाँ अक़्सर पिज़्ज़ा देने आता है ■■
★★ प्रस्तुति - साक्षी 
गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5 रविग्राम तेलीबांधा रायपुर छग 492006
मोबाइल 8109224468 

Sunday, October 31, 2021

होमी जहांगीर 30 अक्टूबर

डॉ. होमी जहांगीर भाभा 1950 से 1966 तक परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष और भारत सरकार के सचिव थे। वो कभी भी अपने चपरासी को अपना ब्रीफ़केस उठाने नहीं देते थे। ख़ुद उसे ले कर चलते थे जो कि बाद में विक्रम साराभाई भी किया करते थे। वो हमेशा कहते थे कि पहले मैं वैज्ञानिक हूँ और उसके बाद परमाणु ऊर्जा आयोग का अध्यक्ष। एक बार वो किसी सेमिनार में भाषण दे रहे थे तो सवाल जवाब के समय एक जूनियर वैज्ञानिक ने उनसे एक मुश्किल सवाल पूछा। भाभा को ये कहने में कोई शर्म नहीं आई कि अभी इस सवाल का जवाब उनके पास नहीं है। मैं कुछ दिन सोच कर इसका जवाब दूंगा।

ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व था भारत के परमाणु कार्यक्रम के जनक का!

डॉ. होमी जहाँगीर भाभा का जन्म मुम्बई के एक पारसी परिवार में 30 अक्टूबर, 1909 को हुआ था। 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने बम्बई के एक हाईस्कूल से सीनियर कैम्ब्रिज की परीक्षा पास की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय गए। उनकी ज्ञान और प्रतिभा से परिचित कुछ नामी विश्वविद्यालयों ने उनको अध्यापन कार्य के लिये आमंत्रित किया लेकिन उन्होंने 'भारतीय विज्ञान संस्थान' (IISc) बैंगलोर को चुना जहाँ वे भौतिक शास्त्र विभाग के प्राध्यापक के पद पर रहे।

उस वक़्त सर सी. वी. रमन भौतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख थे और उन्हें डॉ. भाभा शुरू से ही पसंद थे। उन्होंने डॉ. भाभा को फैलो ऑफ़ रायल सोसायटी में चयन हेतु भी मदद की। बैंगलोर में डॉ. भाभा कॉस्मिक किरणों के हार्ड कम्पोनेंट पर रिसर्च कर रहे थे लेकिन उन्हें देश में विज्ञान की उन्नति के बारे में बहुत चिंता थी।

चूँकि बैंगलोर का संस्थान देश में वैज्ञानिक क्रांति के लिए पर्याप्त नहीं था, उन्होंने परमाणु विज्ञान में रिसर्च करने के लिए एक अलग संस्थान बनाने की सोची और सर दोराब जी टाटा ट्रस्ट से मदद माँगी।

1 जून, 1945 को उनके द्वारा प्रस्तावित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) के एक छोटे से रूप का श्रीगणेश हुआ। डॉ. भाभा ने अपनी वैज्ञानिक और प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ TIFR की इमारत की भी ज़िम्मेदारी उठायी। उन्होंने इसे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ संस्थानों में खड़ा करने का सपना देखा। साल 1962 में TIFR पूरी तरह से फंक्शनल हो चूका था।

यह डॉ. भाभा के प्रयासों का ही प्रतिफल है कि आज विश्व के सभी विकसित देशों में भारत के नाभिकीय वैज्ञानिकों की प्रतिभा एवं क्षमता का लोहा माना जाता है।

आज उनके जन्मदिवस पर हम उनको नमन करते हैं।

Monday, October 25, 2021

ईश्वर का न्याय

#ईश्वर_का_न्याय

 *एक रोज रास्ते में एक महात्मा अपने शिष्य के साथ भ्रमण पर निकले. गुरुजी को ज्यादा इधर-उधर की बातें करना पसंद नहीं था, कम बोलना और शांतिपूर्वक अपना कर्म करना ही गुरू को प्रिय था।*
परन्तु शिष्य बहुत चपल था, उसे हमेशा इधर-उधर की बातें ही सूझती, उसे दूसरों की बातों में बड़ा ही आनंद आता था।
चलते हुए जब वो तालाब से होकर गुजर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक झींवर नदी में जाल डाले हुए है. शिष्य यह सब देख खड़ा हो गया और झींवर को ‘अहिंसा परमोधर्म’ का उपदेश देने लगा।
लेकिन झींवर कहाँ समझने वाला था, पहले उसने टालमटोल करनी चाही और बात जब बहुत बढ़ गयी तो शिष्य और झींवर के बीच झगड़ा शुरू हो गया. यह झगड़ा देख गुरूजी जो उनसे बहुत आगे बढ़ गए थे, लौटे और शिष्य को अपने साथ चलने को कहा एवं शिष्य को पकड़कर ले चले।
गुरूजी ने अपने शिष्य से कहा- “बेटा हम जैसे साधुओं का काम सिर्फ समझाना है, लेकिन ईश्वर ने हमें दंड देने के लिए धरती पर नहीं भेजा है!” शिष्य ने पुछा- “महाराज को न तो बहुत से दण्डों के बारे में पता है और न ही हमारे राज्य के राजा बहुतों को दण्ड देते हैं. तो आखिर इसको दण्ड कौन देगा?”
शिष्य की इस बात का जवाब देते हुए गुरूजी ने कहा- “बेटा! तुम निश्चिंत रहो इसे भी दण्ड देने वाली एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में मौजूद है जिसकी पहुँच सभी जगह है… ईश्वर की दृष्टि सब तरफ है और वो सब जगह पहुँच जाते हैं।
इसलिए अभी तुम चलो, इस झगड़े में पड़ना गलत होगा, इसलिए इस झगड़े से दूर रहो..! शिष्य गुरुजी की बात सुनकर संतुष्ट हो गया और उनके साथ चल दिया।
इस बात को ठीक दो वर्ष ही बीते थे कि एक दिन गुरूजी और शिष्य दोनों उसी तालाब से होकर गुजरे, शिष्य भी अब दो साल पहले की वह झींवर वाली घटना भूल चूका था.. उन्होंने उसी तालाब के पास देखा कि एक चुटीयल साँप बहुत कष्ट में था उसे हजारों चीटियाँ नोच-नोच कर खा रही थीं। शिष्य ने यह दृश्य देखा और उससे रहा नहीं गया, दया से उसका ह्रदय पिघल गया था।
 वह सर्प को चींटियों से बचाने के लिए जाने ही वाला था कि गुरूजी ने उसके हाथ पकड़ लिए और उसे जाने से मना करते हुए कहा-“ बेटा! इसे अपने कर्मों का फल भोगने दो.. यदि अभी तुमने इसे रोकना चाहा तो इस बेचारे को फिर से दुसरे जन्म में यह दुःख भोगने होंगे क्योंकि कर्म का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है..।
शिष्य ने गुरूजी से पुछा- “गुरूजी इसने कौन-सा कर्म किया है जो इस दुर्दशा में यह फँसा है?”
गुरू महाराज बोले- “यह वही झींवर है जिसे तुम पिछले वर्ष इसी स्थान पर मछली न मारने का उपदेश दे रहे थे और वह तुम्हारे साथ लड़ने के लिए आग-बबूला हुआ जा रहा था। वे मछलियाँ ही चींटी है जो इसे नोच-नोचकर खा रही है..”।
यह सुनते ही बड़े आश्चर्य से शिष्य ने कहा- गुरूजी, यह तो बड़ा ही विचित्र न्याय है।
गुरुजी ने कहा- “बेटा! इसी लोक में स्वर्ग-नरक के सारे दृश्य मौजूद हैं, हर क्षण तुम्हें ईश्वर के न्याय के नमूने देखने को मिल सकते हैं।
चाहे तुम्हारे कर्म शुभ हो या अशुभ उसका फल तुम्हें भोगना ही पड़ता है।
इसलिए ही वेद में भगवान ने उपदेश देते हुए कहा है- अपने किये कर्म को हमेशा याद रखो, यह विचारते रहो कि तुमने क्या किया है, क्योंकि ये सच है कि तुमको वहाँ भोगना पड़ेगा..।
जीवन का हर क्षण कीमती है इसलिए इसे बुरे कर्म के साथ व्यर्थ जाने मत दो।
 अपने खाते में हमेशा अच्छे कर्मों की बढ़ोत्तरी करो क्योंकि तुम्हारे अच्छे कर्मों का परिणाम बहुत सुखद रूप से मिलेगा इसका उल्टा भी उतना ही सही है, तुम्हारे बुरे कर्मों का फल भी एक दिन बुरे तरीके से भुगतना पड़ेगा।
          *इसलिए कर्मों पर ध्यान दो क्योंकि वो ईश्वर हमेशा न्याय ही करता है..”।*
         *शिष्य गुरुजी की बात स्पष्ट रूप से समझ चुका था…*

प्रस्तुति 
साक्षी

गुरुबक्षणी निवास स्ट्रीट 5  धर्मशाला के सामने रविग्राम तेलीबांधा रायपुर 492006 मोबाइल 8109224468

Sunday, October 24, 2021

बचपन के दिन

ग्रामीण इलाकों में तब प्राइवेट स्कूल का चलन भी नहीं था। चौथी क्लास से पांचवीं में जाने पर किसी दिन तय होता था कि आज पांचवीं की पुस्तक आएगी। पापा के बाजार जाने के बाद उनके आने की बेशब्री से प्रतीक्षा रहती थी। दूर से ही उनके हाथ पर नजर रहती थी। भारी पैकेट देखकर अंदाजा हो जाता था कि किताब ही है ये। फिर खुशी से उस पैकेट को खोलना, किताबों के पन्ने को बार बार सुंघना, उस पर अखबार का जिल्द लगाना.....

तब अधिकतर लकड़ी या स्टोव पर ही खाना बनता था। कालोनी में एक दो जगह पर एल पी जी गैस आ जाने पर मम्मी का बार बार रुठना और पापा से झगड़ा करना फिर पापा का आजिज आकर गैस चुल्हा खरीदना। जिस दिन आना था उस दिन सारा दिन इंतजार करना फिर गैस चुल्हा आने पर पहले उस पर खीर बनना......

संबंधियों में किसी के विवाह में शामिल होने के आमंत्रण से मम्मी पापा का संभावित खर्चे को लेकर गंभीर और चींतीत होना फिर सबों के लिए कपड़ा खरीदने के लिए पापा का बाजार निकल पड़ना। हमलोगो द्वारा इतरा इतरा कर कालोनी के दोस्तों को बताना कि फलां तारिख को हमलोगो फुफा के यहां शादी में जा रहे हैं और हमलोगो का बस और ट्रेन के सफर के बारे में सोच सोच कर रोमांचित होना.....

लगता है पिछले जन्म की बात हो....यकीन नहीं होता कि वो सुनहरा पर हमने इसी जीवन में जिया है। आज लाखों की आमदनी, कार, बड़ा घर लेकिन जीवन में वो वाला जायका नहीं।

Monday, October 11, 2021

घुटनों का दर्द

*घुटनों का दर्द*


घुटनों का दर्द बहुत ही पीड़ादायक होता है और यह  आपको चलने-फिरने में भी.  असमर्थ कर देता है। यदि आपका वजन अधिक हो या आप वृद्धावस्था में हों तो घुटनों का दर्द और भी तकलीफदेह हो जाता है।
यह बात कम ही लोग जानते हैं कि कुछ आसान घरेलू उपायों की मदद से घुटनों के दर्द की इस तकलीफ से छुटकारा पाया जा सकता है।

जी हाँ !

*यदि आप निम्नलिखित कारणों से घुटनों के दर्द से पीड़ित है !*

   घुटनों की माँसपेशियो में खून का दौरा सही नहीं होना।

   घुटनों की माँसपेशियो में खिंचाव या तनाव होना।

   माँसपेशियो में किसी भी तरह की चोट का प्रभाव।

   वृद्धावस्था । 
तो नीचे बताये गए पांच घरेलू उपाय आपको घुटनों के दर्द से छुटकारा दिला सकते हैं !


*घुटनों के दर्द के उपाय*

 पहला
नीचे बताई गयी सामग्री को मिला कर हल्दी का एक दर्द निवारक पेस्ट बना लीजिये!

   1 छोटा चम्मच हल्दी पाउडर
   1 छोटा चम्मच पीसी हुई चीनी, या बूरा या शहद
   1 चुटकी चूना (जो पान में लगा कर खाया जाता है)
     आवश्यकतानुसार पानी
इन सभी को अच्छी तरह मिला लीजिये ।
एक लाल रंग का गाढ़ा पेस्ट बन जाएगा।
यह पेस्ट कैसे प्रयोग करें

सोने से पहले यह पेस्ट अपने घुटनों पे लगाइए ।

इसे सारी रात घुटनों पे लगा रहने दीजिये।

सुबह साधारण पानी से धो लीजिये।

कुछ दिनों तक प्रतिदिन इसका इस्तेमाल करने से सूजन, खिंचाव, चोट आदि के कारण होने वाला घुटनों का दर्द पूरी तरह ठीक हो जाएगा।

 उपाय 2.  
1 छोटा चम्मच सोंठ का पाउडर लीजिये और इसमें थोडा सरसों का तेल मिलाइए।
इसे अच्छी तरह मिला कर गाड़ा पेस्ट बना लीजिये।
इसे अपने घुटनों पर मलिए ।
इसका प्रयोग आप दिन या रात कभी भी कर सकते हैं।
कुछ घंटों बाद इसे धो लीजिये।
यह प्रयोग करने से आपको घुटनों के दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलेगा।

   उपाय 3
नीचे बताई गयी सामग्री लीजिये :-
       4-5 बादाम
       5-6 साबुत काली मिर्च
       10 मुनक्का
        6-7 अखरोट
प्रयोग 
इन सभी चीज़ों को एक साथ मिलाकर खाएं और साथ में गर्म दूध पीयें।
कुछ दिन तक यह प्रयोग रोजाना करने से आपको घुटनों के दर्द में आराम मिलेगा।

 उपाय 4
खजूर विटामिन ए, बी, सी, आयरन व फोस्फोरस का एक अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। इसलिए खजूर घुटनों के दर्द सहित सभी प्रकार के जोड़ों के दर्द के लिए बहुत असरकारक है।

प्रयोग 
एक कप पानी में 7-8 खजूर रात भर भिगोयें ।
सुबह खाली पेट ये खजूर खाएं और जिस पानी में खजूर भिगोये थे, वो पानी भी पीयें। 
ऐसा करने से घुटनों की मांसपेशियां मजबूत होती हैं, और घुटनों के दर्द में बहुत लाभ मिलता है। 

   उपाय 5 
नारियल भी घुटनों के दर्द के लिए बहुत अच्छी औषधी है।

नारियल का प्रयोग  

     रोजाना सूखा नारियल खाएं।
     नारियल का दूध पीयें।
     घुटनों पर दिन में दो बार नारियल के तेल की मालिश करें।
इससे घुटनों के दर्द में अद्भुत लाभ होता है। 

आशा है आपको इन आसान घरेलू उपायों की मदद से घुटनों के दर्द से छुटकारा मिलेगा और आपकी ज़िंदगी बेहतर हो सकेगी।

कदीपत्ते की चटनी

*कढ़ीपत्ते की चटनी*                          

सामग्री : 

तेल 2 टी स्पून , कढ़ीपत्ते 25-30 , कसा हुआ सूखा नारियल आधा कप , भूने चने की दाल पाव कप , तिल 1 टेबल स्पून , सूखी लाल मिर्च 4-5 , इमली 3-4 टुकड़े , नमक स्वादानुसार । 

विधि : 

तेल गरम करके उसमें कढ़ीपत्ते डालकर उन्हें कुरकुरा होने तक भून लें ।फिर उसमें बाकी सभी सामग्री डालकर और थोड़ा भूने ।मिश्रण ठंडा होने के बाद मिक्सी में पीसकर उसका पाऊडर बनाएं ।

मैसूर चटनी

*मैसूर चटनी ( मैसूर दोसा चटनी)*
                                
सामग्री : 

तेल 2 टी स्पून , चने की दाल 4 टेबल स्पून , उड़द की दाल 2 टेबल स्पून , सूखी लाल मिर्च 2-3 , काली मिर्च 4-5 दाने , कसा हुआ नारियल 2 टेबल स्पून , इमली 3-4 टुकड़े , नमक -गुड़ स्वादानुसार ।   

                                
विधि : 

तेल गरम करके उसमें चने व उड़द की दाल डालकर उसे थोड़ा भूनें । दोनों दाले लाल हो जाए तब उसमें लाल मिर्च , काली मिर्च , नारियल और इमली डालकर थोड़ा भूनें ।नमक और गुड़ तथा आवश्यकतानुसार पानी डालकर महीन पीस लें ।

टमाटर की चटनी

*टमाटर की चटनी*
     
सामग्री चटनी के लिए :
तेल 1 टेबल स्पून , चने की दाल 2 टेबल स्पून , सूखी लाल मिर्च 3-4 , हल्दी पाव टी स्पून , हींग पाव टी स्पून , बारीक कटे टमाटर 1 कप , नमक स्वादानुसार । 

सामग्री तड़के के लिए :

तेल 1 टेबल स्पून , राई -हींग तड़के के लिए ,  सूखी लाल मिर्च 2 , कढ़ीपत्ते 4-5। 

विधि : 

तेल गरम करके उसमें चने की दाल डालकर उसे लाल होनें तक भूनें ।फिर उसमें सूखी मिर्च , हल्दी और हींग डालकर थोड़ा भूनें ।टमाटर डालकर टमाटर नरम होनें तक पकाएं ।यह मिश्रण ठंड़ा होनें पर मिक्सी में पीस लें ।गरम तेल में राई-हींग का तड़का लगाकर उसमें सूखी लाल मिर्च और कढ़ीपत्ते डालकर चटनी में मिलाएं ।

हरी धनिया पुदीने की चटनी

*हरा धनिया पुदिने की चटनी*

सामग्री : 

हरा धनिया आधा कप , पुदीने के पत्ते 10-15 , कसा कच्चा आम 2 टेबल स्पून या नींबू का रस 1 टेबल स्पून , हरी मिर्च 3-4 , जीरा 1 टी स्पून , नमक -चीनी स्वादानुसार । 

विधि : 

सभी सामग्री मिलाकर चटनी पीस लें ।

हरी धनिया की सैंडविच चटनी

*हरे धनिये की चटनी सैंडविच चटनी* 

सामग्री : 

हरा धनिया आधा कप , हरी मिर्च 3-4 , कसा अदरक 1 टी स्पून , ताजा कसा नारियल 2 टेबल स्पून , मूंगफली का चूरा 1 टेबल स्पून , नींबू का रस 1 टेबल स्पून या कच्चा आम 2 टेबल स्पून , नमक -चीनी स्वादानुसार ।
                                
विधि : 

सभी सामग्री मिलाकर चटनी पीस लें ।

नींबू की चटनी

*नींबू की चटनी* 
      
सामग्री : 

नींबू 4 , चीनी आधा कप ,  तेल 1 टी स्पून , मैथीदाने 6-7 दाने,  हींग पाव टी स्पून , जीरा पाउडर 1 टी स्पून , लाल मिर्च पाउडर आधा टी स्पून , नमक स्वादानुसार । 
                              

विधि : 

नींबू का छिलका उतारकर उन्हें प्रत्येक को 4 टुकड़ों में काटें और उनके अंदर के बीज निकाल लें ।तेल गरम करके उसमें मैथीदाने डालें ।फिर हींग , जीरा और लाल मिर्च पाउडर डालकर थोड़ा -सा भून लें ।चटनी की सभी सामग्री मिलाकर मिक्सी में पीसें ।

हरी धनिया सेव की चटनी

*हरा धनिया सेव की चटनी* 

सामग्री चटनी के लिए : 

भावनगरी या फीकी बेसन की सेव पाव कप ,  हरा धनिया पाव कप , पुदीने के पत्ते 15-20 , हरी मिर्च 2-3 , कसा हुआ अदरक 1 टी स्पून ,  दही पाव कप , नमक -चीनी स्वादानुसार । 

सामग्री तड़के के लिए : 

तेल 2 टी स्पून , जीरा -हींग , हल्दी चुटकी भर , कढ़ीपत्ते 2-3 ।                

विधि : 

चटनी की सभी सामग्री मिलाकर चटनी पीस लें ।तेल गरम करकें उसमें जीरा-हींग का तड़का लगा लें और फिर उसमें हल्दी और कढ़ीपत्ते डाले ।यह तड़का चटनी में मिलाएं ।

दही वाली हरी मिर्च

*दही वाली हरी मिर्च*            

सामग्री : 

तेल 1 टेबल स्पून , राई-जीरा-हींग तड़के के लिए , हल्दी पाव टी स्पून , बड़े टुकड़ों में कटी हरी मिर्च 8-10 , नमक 1 टी स्पून , दही पाव कप ।  
               
विधि : 

तेल गरम करके उसमें राई-जीरा -हींग का तड़का लगाएं ।फिर उसमें हल्दी , हरी मिर्च और नमक डालकर ढंककर पकाएं । मिर्च थोड़ी नरम हो जाएं तब उसे कटोरी से थोड़ा मसलकर उसमें दही मिलाएं ।अच्छे से मिलाकर दही का पानी सूखनें तक पकाएं ।

हरी मिर्च मूंगफली की चटनी

*हरी मिर्च मूंगफली की खर्डा चटनी* 

सामग्री पीसने के लिए : 

हरी मिर्च 12-15 , हरा धनिया 2 टेबल स्पून , मूंगफली पाव कप , जीरा 1 टी स्पून , नमक स्वादानुसार । 

सामग्री तड़के के लिए : 

तेल 1 टेबल स्पून , नींबू का रस 1 टी स्पून ।  
                      
विधि : 

पीसने की सभी सामग्री मिलाकर थोड़ा मोटा पीस लें ।तड़के के लिए तेल गरम करके उसमें राई -जीरा -हींग का तड़का लगाकर फिर उसमें पीसी चटनी डालें । चटनी थोड़ी सूखी होने तक भूनिए ।

व्यंजन

*चना दाल की चटनी*           

सामग्री चटनी के लिए : 

चने की दाल आधा कप ( आधा घंटा पानी में भिगोकर पानी निथारी हुई ) , हरी मिर्च 3-4 , कसा हुआ कच्चा आम 2 टेबल स्पून या नींबू का रस 1 टेबल स्पून या दही आधा कप , हरा धनिया 2 टेबल स्पून , नमक -चीनी स्वादानुसार । 

सामग्री तड़के के लिए : 

तेल 2 टी स्पून , जीरा -हींग तड़के के लिए , हल्दी चुटकी भर , सूखी लाल मिर्च 2 , कढ़ीपत्ते 2-3 । 

विधि : 

चटनी की सभी सामग्री मिलाकर चटनी पीसें ।तेल गरम करकें उसमें जीरा-हींग का तड़का लगाकर हल्दी डालें । लाल मिर्च के टुकड़े और कढ़ीपत्ते डालकर यह तड़का चटनी में मिलाएं ।

डेंगू

डेंगू से बचाव 
*डेंगू बुखार फैल रहा है। अपने घुटनों से पैर के पंजे तक 200 एम.एल.नारियल  के  तेल में 2 कपूर बट्टी गर्म करके मिला हुवा (coconut oil) लगायें। यह एक एंटीबायोटिक परत की तरह सुबह से शाम तक काम करता है। 👍🏻डेंगू का मच्छर घुटनों तक की ऊँचाई से ज्यादा नही उड़ सकता है।*

किसी को dengu हुआ हो तो हरी ईलायची के दानो को मुँख में दोनो तरफ रखे, ख्याल रहे , चबाये नही. खाली मुँख में रखने से ही खून के कण नार्मल और प्लेटलेट्स तुरंत ही बढ़ जाते हैं । और पपीते के कोमल पत्ते का ताजा रस निकालकर शहद के साथ सेवन करने से भी प्लेटलेट तुरंत ही बढ़ने लगते है ।

यह संदेश सभी को भेजने की नम्र विनंती है .डेंगू को 48 घंटे मे समाप्त
करने की क्षमता रखने वाली
आयुर्वेदिक पतंजलि  डेंगू नील वटी भी लाभदायक है 

भेजे महत्वपूर्ण सूचना :-  
*यदि किसी को डेगूँ या साधारण बुखार के कारण प्लेटलेट्स कम हो गयी है तो एक पतंजलि की डेंगू निल वटी दवा आपके शहर के पतंजलि चिकित्सालय मंगलम काम्प्लेक्स पर भी उपलब्ध हो जायेगी* 
 इंसमे निम्न घटक हैऑ
पपाया (पपीते के पत्ते)
गिलोय ,एलोवेरा,अनारदाना ,तुलसी आदि से बनाया गया है।
इसकी 1 से 2  गोली खाली पेट सुबह शाम खिलाये 
यदि आप पुण्यं कमाना चाहते हैं तो यह संदेश धर्म-प्रसाद मान कर सभी को प्रेषित करे
🦟💊🦟💊🦟💊🦟💊🦟💊

घरेलू नुस्खे

*मस्से को दूर करने के उपाय*
●मस्से सुंदरता पर दाग की तरह दिखाई देते हैं।
●मस्से होने का कारण पेपीलोमा वायरस है।
●त्वचा पर पेपीलोमा वायरस के आ जाने से छोटे, खुरदुरे कठोर पिंड बन जाते हैं, जिन्हें मस्सा कहा जाता है।
●पहले मस्से की समस्या अधेड़ उम्र के लोगों में अधिक होती थी, लेकिन आजकल युवाओं में भी यह समस्या होने लगी है। 
●यदि आप भी मस्सों से परेशान हैं तो इनसे राहत पाने के लिए कुछ घरेलू उपायों को अपना सकते हैं। 

*जानिये, कुछ ऐसे ही घरेलू नुस्खों के बारे में....*

*(1).* बेकिंग सोडा और अरंडी तेल को बराबर मात्रा में मिलाकर इस्तेमाल करने से मस्से धीरे-धीरे खत्म हो जाते हैं।

*(2).* बरगद के पत्तों का रस मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। 
इसके रस को त्वचा पर लगाने से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने-आप गिर जाते हैं।

*(3).* ताजा अंजीर मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगाएं। 30 मिनट तक लगा रहने दें।
फिर गुनगुने पानी से धो लें। 
मस्से खत्म हो जाएंगे।

*(4). खट्टे सेब का जूस निकाल लीजिए।*
दिन में कम से कम तीन बार मस्से पर लगाइए, मस्से धीरे-धीरे झड़ जाएंगे।

*(5).* चेहरे को अच्छी तरह धोएं और कॉटन को सिरके में भिगोकर तिल-मस्सों पर लगाएं।
दस मिनट बाद गर्म पानी से फेस धो लें।
कुछ दिनों में मस्से गायब हो जाएंगे।

*(6).* आलू को छीलकर उसकी फांक को मस्सों पर लगाने से मस्से गायब हो जाते हैं।

*(7).* कच्चा लहसुन मस्सों पर लगाकर उस पर पट्टी बांधकर एक सप्ताह तक रहने दें।
एक सप्ताह बाद पट्टी खोलने पर आप पाएंगे कि मस्से गायब हो गए हैं।

*(8).* मस्सों से जल्दी निजात पाने के लिए आप एलोवेरा के जैल का भी उपयोग कर सकते हैं।

*(9).* हरे धनिए को पीसकर उसका पेस्ट बना लें और इसे रोजाना मस्सों पर लगाएं।

*(10).*  ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगाएं। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। मस्से गायब हो जाएंगे।

*(11).* केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। 
ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें, जब तक कि मस्से खत्म नहीं हो जाते।

*(12).* मस्सों पर नियमित रूप से प्याज मलने से भी मस्से गायब हो जाते हैं।

*(13).* फ्लॉस या धागे से मस्से को बांधकर दो से तीन सप्ताह तक छोड़ दें।
इससे मस्से में रक्त प्रवाह रुक जाएगा और वह खुद ही निकल जाएगा।

*(14).* अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगाएं। 
इससे मस्से नरम पड़ जाएंगे और धीरे-धीरे गायब हो जाएंगे।

*नस पर नस चढ़ना /बायंटे आना*

*नस पर नस चढ़ना /बायंटे आना*

 *👉🏻 लोगों के शरीर में किसी ना किसी हिस्से में नस चढ़ जाती है जिससे कि उन्हें बहुत  परेशानियों का सामना करना पड़ता है। यह परेशानी हमेशा पैरों,बाजू और टांगों में देखने को मिलती है।* 

*1.  अगर आपके पैर की नस चढ़ गई है तो रात को सोते समय तकिए के ऊपर पैर रखकर सोऐं, ऐसा करने से नस उतर जाती है और आपको दर्द से भी राहत मिलती है|*

 *2.   अगर नस चढ़ जाए तो बर्फ का एक टुकड़ा लेकर बर्फ को उस हिस्से पर लगाएं जहां आप की नस चढ़ी है बर्फ की मसाज करने से आपकी नस उतर जाती है|*

 *3.   अपने खान पान का ध्यान रखें क्योंकि शरीर में कमजोरी आने से भी नस चढ़ जाती है इसलिए किशमिश अखरोट और बादाम का सेवन जरूर करें|*

 *4.   अगर आपकी पैर की नस चढ़ जाए तो उसके विपरीत कान के नीचे वाले हिस्से को जोर से दबाओ इससे कुछ ही क्षणों में दर्द खत्म हो जाएगा और नस भी उतर जाएगी|*

 *5.  केले का सेवन करने से भी नस उतर जाती है क्योंकि केले में पोटेशियम होता है इससे ना केवल नस चढ़ने की बल्कि शरीर की अन्य बीमारियों से भी आपको राहत़ मिलती है दो केले का सेवन आपको जरूर करना चाहिए|*

  *6.  जिस पैर की नस चढ़ी हो उस पैर की ओर की हाथ की बीच की उंगली को नाखून के नीचे वाले हिस्से को दबाए इससे जिस पैर में आपके नस चढ़ी होगी वह चुटकियों में उतर जाएगी|*

*7.  नस चढ़ना शरीर में विटामिनों की कमी का संकेत है,करीब एक महीना एक गोली मल्टी विटामिन की सुबह नाश्ते अथवा भोजन के बाद लें,पर यह अस्थाई उपचार है।आपको प्रतिदिन मौसम के कोई भी 2 फल,भोजन के साथ सलाद लेने ही चाहिए।*

चूना 70 बीमारी दूर करता है

#चूना जो पान में लगा के खाया जाता है , उसकी एक डिब्बी ला कर घर में रखे .

- यह सत्तर प्रकार की बीमारियों को ठीक कर देता है . गेहूँ के दाने के बराबर चूना गन्ने के रस में मिलाकर पिलाने से बहुत जल्दी #पीलिया ठीक हो जाता है .

- चूना #नपुंसकता की सबसे अच्छी दवा है - अगर किसी के शुक्राणु नही बनता उसको अगर गन्ने के रस के साथ चूना पिलाया जाये तो साल डेढ़ साल में भरपूर शुक्राणु बनने लगेंगे . जिन माताओं के शरीर में अन्डे नही बनते उन्हें भी इस चूने का सेवन करना चाहिए .

- #शुगर  रोज़ सुबह ख़ाली पेट एक गिलास पानी में एक छोटे चने के बराबर चुना मिलकर पीने से शुगर जड़ से ख़त्म हो जाती हैं ( समय समय पर जाँच करवाते रहे.. वरना शुगर का लेवल माइनस भी हो सकता हैं )

- विद्यार्थीओ के लिए चूना बहुत अच्छा है जो #लम्बाई बढाता है - गेहूँ के दाने के बराबर चूना रोज दही में मिला के खाना चाहिए, दही नही है तो दाल में मिला के या पानी में मिला के लिया जा सकता है - इससे लम्बाई बढने के साथ साथ स्मरण शक्ति भी बहुत अच्छी होती है । जिन बच्चों की बुद्धि कम है ऐसे मतिमंद बच्चों के लिए सबसे अच्छी दवा है चूना . जो बच्चे बुद्धि से कम है, दिमाग देर में काम करता है, देर में सोचते है हर चीज उनकी स्लो है उन सभी बच्चे को चूना खिलाने से अच्छे हो जायेंगे ।

- बहनों को अपने #मासिक_धर्म के समय अगर कुछ भी तकलीफ होती हो तो उसका सबसे अच्छी दवा है चूना । मेनोपौज़ की सभी समस्याओं के लिए गेहूँ के दाने के बराबर चूना हर दिन खाना दाल में, लस्सी में, नही तो पानी में घोल के पीना चाहिए . इससे ओस्टीओपोरोसिस होने की संभावना भी नहीं रहती .

- जब कोई माँ #गर्भावस्था में है तो चूना रोज खाना चाहिए क्योंकि गर्भवती माँ को सबसे ज्यादा केल्शियम की जरुरत होती है और चूना केल्शियम का सबसे बड़ा भंडार है . गर्भवती माँ को चूना खिलाना चाहिए अनार के रस में - अनार का रस एक कप और चूना गेहूँ के दाने के बराबर ये मिलाके रोज पिलाइए नौ महीने तक लगातार दीजिये तो चार फायदे होंगे - पहला फायदा होगा के माँ को बच्चे के जनम के समय कोई तकलीफ नही होगी और नॉर्मल डीलिवरी होगी , दूसरा बच्चा जो पैदा होगा वो बहुत हृष्ट पुष्ट और तंदुरुस्त होगा , तीसरा फ़ायदा वो बच्चा जिन्दगी में जल्दी बीमार नही पड़ता जिसकी माँ ने चूना खाया , और चौथा सबसे बड़ा लाभ है वो बच्चा बहुत होशियार होता है बहुत Intelligent और Brilliant होता है उसका IQ बहुत अच्छा होता है .

- चूना #घुटने_क_दर्द ठीक करता है , कमर का दर्द ठीक करता है , कंधे का दर्द ठीक करता है, एक खतरनाक बीमारी है Spondylitis वो चुने से ठीक होता है . कई बार हमारे रीढ़ की हड्डी में जो मनके होते है उसमे दूरी बढ़ जाती है Gap आ जाता है जिसे ये चूना ही ठीक करता है . रीढ़ की हड्डी की सब बीमारिया चूने से ठीक होती है . अगर हड्डी टूट जाये तो टूटी हुई हड्डी को जोड़ने की ताकत सबसे ज्यादा चूने में है . इसके लिए चूने का सेवन सुबह खाली पेट करे .

- अगर मुंह में ठंडा गरम पानी लगता है तो चूना खाने से बिलकुल ठीक हो जाता है , मुंह में अगर छाले हो गए है तो चूने का पानी पिने से तुरन्त ठीक हो जाता है । शरीर में जब खून कम हो जाये तो चूना जरुर लेना चाहिए , एनीमिया है खून की कमी है उसकी सबसे अच्छी दवा है ये चूना . गन्ने के रस में , या संतरे के रस में , नही तो सबसे अच्छा है अनार के रस में डाल कर चूना ले . अनार के रस में चूना पिने से खून बहुत बढता है , बहुत जल्दी खून बनता है - एक कप अनार का रस गेहूँ के दाने के बराबर चूना सुबह खाली पेट ले .

- भारत के जो लोग चूने से पान खाते है, बहुत होशियार है और वे महर्षि वाग्भट के अनुयायी है . पर पान बिना तम्बाखू , सुपारी और कत्थे के ले . तम्बाखू ज़हर है और चूना अमृत है . कत्था केन्सर करता है, पान में सौंठ , इलायची , लौंग , केसर , सौंफ , गुलकंद , चूना , कसा हुआ नारियल आदि डाल के खाए .

- अगर घुटने में घिसाव आ गया हो और डॉक्टर कहे के घुटना बदल दो तो भी जरुरत नही चूना खाते रहिये और हरसिंगार ( पारिजातक या प्राजक्ता ) के पत्ते का काढ़ा पीजिये , घुटने बहुत अच्छे काम करेंगे । 

चूना खाइए पर चूना लगाइए मत  .
ये चूना लगाने के लिए नही है खाने के लिए है.
.

कच्चे आम-पुदीने की चटनी*

*कच्चे आम-पुदीने की चटनी*
सामग्री:-
2 कच्चे आम
एक कप पुदीना पत्तियां
3 से 4 हरी मिर्च, कटी हुईं
आधा छोटा चम्मच जीरा पाउडर
आधी छोटी चम्मच चीनी
स्वादानुसार नमक

विधि

आम को धोकर छीलें और टुकड़ों में काट लें. पुदीना पत्तियों को भी धोकर काट लें.
अब मिक्सर जार में आम के टुकड़े, पुदीना पत्तियां, हरी मिर्च, जीरा पाउडर, चीनी, नमक और एक चम्मच पानी डालकर बारीक पीस लें।

Tuesday, October 5, 2021

मानदेय बढ़ाने प्रदर्शन ।




रायपुर के सप्रे स्कूल के नजदीक छत्तीसगढ़ शासकीय स्कूल सफाई कर्मचारी संगठन द्वारा आज शाम मानदेय बढ़ाने को लेकर बड़ा धरना प्रदर्शन किया गया

परदेसी सिद्धार्थ कोमल जनसम्पर्क के नए सचिव बने

परदेशी सिद्धार्थ कोमल  को सचिव मुख्यमंत्री तथा अतिरिक्त प्रभार सचिव लोक निर्माण विभाग,सचिव विमानन विभाग तथा सचिव खनिज संसाधन विभाग को उनके वर्तमान कर्तव्यों के साथ -साथ सचिव जनसंपर्क विभाग का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है।
एस.भारतीदासन को आयुक्त सह संचालक जनसंपर्क व पदेन मुख्य कार्यपालन अधिकारी छग संवाद के अतिरिक्त प्रभार से मुक्त किया गया है। शेष प्रभार यथावत रहेंगे। वहीं सुश्री तुलिका प्रजापति उप सचिव मंत्रालय को अस्थायी रूप से आगामी आदेश पर्यन्त उपसचिव कृषि विभाग के पद पर पदस्थ किया गया है। सामान्य प्रशासन विभाग के सचिव डा. कमलप्रीत के हवाले से आज उक्त शासकीय आदेश जारी हुआ है।

पूत सपूत तो क्यों धन संचय !पूत कपूत तो क्यों धन संचय !


जिसने भी ये कहावत बनाई होगी वो या तो पूरी तरह से स्वार्थी इंसान रहा होगा जो 'अपने' 'पूत' के बाहर जाकर कुछ देख ही नहीं पाया होगा, तो उसकी कोई बेटी नहीं होगी, उसकी बीवी नहीं होगी, उसके माँ बाप भाई बहन कोई नहीं रहे होंगे। या तो वो निहायती आलसी और कामचोर आदमी रहा होगा और काम से बचने के लिए उसने ये मुहावरा बना दिया होगा। 
पहले ये स्पष्ट समझिये कि आखिर सपूत होता क्या है, और कपूत किसे मानते हैं? जो अच्छी आदतो वाला है जो माँ बाप का फरमाबरदार है उनकी सेवा और मदद करता है, नाम रोशन करता है वो सपूत है और जो ये करने में असफल हो जाता है वो कपूत है। लेकिन  पूत सपूत है या कपूत ये तो प्रमाणों की एक श्रृंखला के बाद ही सिद्ध होगा। पूत एकाध बार दारू पीकर आ गया, चोरी छुपे सिगरेट पी लेता है, लड़की के चक्कर मे कहीं उलझ गया, काम काज कुछ नहीं जम पाया तो क्या उसे सारी ज़िन्दगी के लिए कपूत सिद्ध कर दिया जाए? 
पूत जब सपूत निकलता है तो आप श्रेय लेते हैं आखिर संस्कार किसके हैं, आखिर खून किसका है? तो जब आपका पूत कपूत निकलता है तो आप ये क्यों कहते हैं कि पता नहीं कहाँ से संस्कार बिगड़ गए? पता नहीं किस जन्म का पाप कट रहा है हमारा ? ये आपके दोगलेपन की निशानी है। 
एक बात अच्छे से याद रखिये, आपकी संतान आपकी ज़िम्मेदारी है, उसके प्रति जागरूक रहिये, बचपन से लेकर अपनी मृत्यु होने तक। उसका सही रारीक़े से पालन पोषण कीजिये। उसे होशियार बनाइये। उसे एक आदर्शों का पुतला नहीं बल्कि एक अनुकूलन करने योग्य इंसान बनाइये। उसके गुणों का श्रेय लेने वालों उसके दोषों को भी स्वीकार कीजिये और उसे कभी अपने प्रेम, अपनी सहायता अपने भरोसे से वंचित मत कीजिये। 
आप याद रखिये आपका सक्षम कपूत हमेशा आपके अक्षम सपूत पर भारी पड़ेगा। इसलिए अपने सपूत को सक्षम बनाइये हर तरीके से। अगर आप पैसा कमाने और संचित करने में अक्षम हैं तो इस कहावत का लाभ मत उठाइये। 
जब तक आप अपने पूत के साथ हैं उसे कोई कपूत नहीं बना सकता। उसके साथ समय बिताइए। उसकी बातों को सुनिये। उससे बातें कीजिये। उसकी शंकाओं को दूर कीजिये।  उसे शारीरिक रूप से सबल मानसिक रूप से प्रबल और चारित्रिक रूप से निष्ठावान बनने में मदद कीजिये। 
पूत को दें कि नहीं दें ये बाद की बात है पहले आप संचित तो कीजिये। कुछ जोड़ के कुछ बचा के दिखाइए। अपने पूत पर सम्यक निवेश तो कीजिये। सोचिये उसकी कितनी इच्छाओं का गला आपने घोंटा है अपनी अक्षमताओं के चलते? उसे कितना नीचा दिखाया है अपनी धारणाओं के चलते? एक परीक्षक एक समीक्षक की बजाए कभी उसे सिर्फ उसके पिता के रूप में देखा आपने ? उसकी हर बात पर आप एक मार्किंग सिस्टम लिये बैठे रहे ये तय करने कि वो सपूत है या कपूत? उसकी अद्वितीयता को उसके अनूठेपन को उसकी वैयक्तिकता को कभी समझने की कोशिश की आपने? 
माफ कीजिये जनाब जिसे आप कपूत समझ रहे हैं वो एक बेहतरीन दोस्त है किसी का जो हर आड़े वक़्त में उसके काम आता है वो एक निष्ठावान प्रेमी है जिसने आंख उठा कर भी किसी दूसरी लड़की को नहीं देखा। वो अपने काम मे ईमानदार है, वो अपने सांसारिक मसलों से अपने दम पर जूझता है। वो आपकी अपेक्षा के अनुरूप अपना कैरियर नहीं बना पाया और आपको समाज मे ये बताने का मौका नही मिला कि 'मेरा' बेटा फलां फलां पोस्ट पर है। उसने हर महीने अपनी आमदनी का अधिकांश भाग चुपचाप माँ के हाथ पर धर दिया। उसने आपको घूर कर नहीं देखा। उसने आपसे ज़िद करना बचपन से ही छोड़ दिया था क्योंकि वो एक कहावत जानता था,  पितर असमरथ कैसी आसा पितर समरथ कैसी आसा!! 
पूत को सिर्फ पूत मानिए। अगर वो सपूत निकला तो आप सुपिता होंगे यदि वो कपूत निकला तो आप भी कुपिता होंगे। 

@ मन्यु आत्रेय

शंकर नगर शांति नगर पूज्य सिंधी पंचायत की सम्पूर्ण कार्यकरिणी

 शंकर नगर शांति नगर पूज्य सिंधी पंचायत की सम्पूर्ण कार्यकरिणी घोषित पहलाज शादीजा अध्यक्ष

बच्चों के सही संस्कार रिश्ते बचाते हैं - राज्यपाल सुश्री उइके जी

 सुश्री अनुसुइया उईके राज्यपाल ने बच्चों के सही संस्कार पर ध्यान देने पर जोर दिया 
 सिंधी महिला सामाजिक संस्था 'सुहिणी सोच'की ओर से 2 अक्टूबर को दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में बहुरानी सम्मेलन कार्यक्रम आयोजित किया गया। मीडिया प्रभारी ज्योति बुधवानी ने बताया कि
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अपने संस्कार,सभ्यता रीति-रिवाज और भाषा को बढ़ावा देकर उसे कायम रखना और नए रिश्तों में मधुरता और सामंजस्य बनाने में बहू बेटियों को उनकी भूमिका से परिचित एवं जागृत  कराना क्योंकि इन्हीं से नई पीढ़ी का निर्माण होता  है।
कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलित और तीन बार गायत्री मंत्र के उच्चारण से हुआ। तत्पश्चात सिंधी गाना और तिल्दा से आई मंडली द्वारा नाटक प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उईके , पूज्य संत श्री साईं युधिष्ठिर लाल जी ,साईं लाल दास जी,राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सुहिणी सोच संस्था के मेंटर सीए चेतन तारवानी और वृंदावन धाम से मानस पुत्री दीदी पुष्पांजलि सम्मिलित हुए।
ट्रेनर के रूप में मुंबई से हीना शहदादपुरी,जोधपुर से अमृता दुदिया और बिलासपुर से विनीता भावनानी थी।
हीना ने बच्चों की परवरिश के बारे में पीपीटी के माध्यम से जानकारी देकर कहा कि पेरेंट्स को बच्चों में कॉन्फिडेंस भरना चाहिए उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए। हर समय दूसरों के सामने बच्चों को पोयम सुनाओ का खिलौना नहीं बनाना चाहिए ।माता और पिता को तालमेल बनाकर चलना चाहिए तभी बच्चे का सर्वांगीण विकास संभव है।बच्चे के किसी भी निर्णय में दोनों का एक मत होना जरूरी है।
अमृता ने अपने ट्रेनिंग सेशन में कहा कि शिक्षा के साथ संस्कार होना बहुत जरूरी है। संस्कार विहीन शिक्षा एटम बम बन सकती है ‌।उन्होंने अपने संबोधन में रीति रिवाज और त्योहारों को परिवार के साथ मनाने में जोर दिया क्योंकि इससे परिवार में एनर्जी के वाइब्रेशन आते हैं ।उन्होंने यह भी कहा कि अपने बच्चों को पॉजिटिव वाइब्रेशन देकर उनकी समस्या को हल करने में मदद करना चाहिए। विनीता भावनानी जी ने कहा कि परिवार में तीन बातें पॉइजन का काम करती है बहस, तुलना और अपेक्षाएं। परिवार में जो बेटी बहू बनकरआती है तो परिवार को प्रेम,प्यार,विश्वास, समर्पण और सम्मान से पहले बहू का दिल जीतना चाहिए तभी वह उसे अपना घर समझेगी,बहू को भी अपने ससुराल में रिश्तो में मधुरता और सामंजस्य बनाना चाहिए।
राष्ट्रीय अध्यक्ष सीए चेतन तारवानी जी ने कहा कि सुनने की कला से आप किसी के जीवन में खास बन सकते हैं। संस्था की संस्थापक मनीषा तारवानी ने कहा कि बच्चों की पहली शिक्षक मां होती है उसी को सुसंस्कृत करने के लिए यह सम्मेलन आयोजित किया क्योंकि बहुओं के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ी में संस्कार हस्तांतरित होंगे।
राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके ने सिंधी समाज के इस सम्मेलन में खुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह समाज की महिलाओं की उन्नति के लिए एक बेहतरीन प्रयास है‌। उन्होंने कहा कि भारत में शादी दो परिवारों का मिलन होती है इसमें हर रिश्ते में समर्पण की भावना होना जरूरी है आजकल परिवार में शादी के बाद जो समस्याएं होती है वह संस्कारों की कमी के कारण ही पैदा होती है उन्होंने आह्वान किया कि अगर बच्चों को पहले से ही संस्कार दिए जाएं तो भविष्य में रिश्ते टूटने से बच सकते हैं।
सम्मेलन में पूज्य संत साईं श्री युधिष्ठिर लाल जी, साईं लाल दास जी, भाभी मां दीपिका जी और वृंदावन से आई मानस पुत्री पुष्पांजलि ने अपने आशीर्वचन से अभिभूत किया और उन्होंने सभी को परिवारों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को शुरू से ही अपनी भाषा और संस्कार ,रीति रिवाज को  मानने के लिए जोर दिया।
कार्यक्रम में रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों से लगभग हजार लोग उपस्थित थे। सुहिणी सोच संस्था को सहयोग करने वाली 12 संस्थाओं को एवं आयोजकों को मोमेंटो देकर उनका सम्मान किया गया । कार्यक्रम का मंच संचालन जूही दरयानी और नीलिमा आहूजा सरिता आहूजा एवं साक्षी मखीजा ने किया, अध्यक्ष पायल जसवानी ने सभी अतिथियों का सम्मान किया।अंत में सचिव माही बुलानी ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया।
प्रेस विज्ञप्ति मीडिया प्रभारी ज्योति बुधवानी के द्वारा जारी की गई।

बच्चों के सही संस्कार से रिश्ते नई ऊंचाइयां छूते है- राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके


 सिंधी महिला सामाजिक संस्था 'सुहिणी सोच'की ओर से 2 अक्टूबर को दीनदयाल उपाध्याय ऑडिटोरियम में बहुरानी सम्मेलन कार्यक्रम आयोजित किया गया। मीडिया प्रभारी ज्योति बुधवानी ने बताया कि
कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य अपने संस्कार,सभ्यता रीति-रिवाज और भाषा को बढ़ावा देकर उसे कायम रखना और नए रिश्तों में मधुरता और सामंजस्य बनाने में बहू बेटियों को उनकी भूमिका से परिचित एवं जागृत  कराना क्योंकि इन्हीं से नई पीढ़ी का निर्माण होता  है।
कार्यक्रम का प्रारंभ दीप प्रज्वलित और तीन बार गायत्री मंत्र के उच्चारण से हुआ। तत्पश्चात सिंधी गाना और तिल्दा से आई मंडली द्वारा नाटक प्रस्तुत किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रुप में राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उईके , पूज्य संत श्री साईं युधिष्ठिर लाल जी ,साईं लाल दास जी,राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सुहिणी सोच संस्था के मेंटर सीए चेतन तारवानी और वृंदावन धाम से मानस पुत्री दीदी पुष्पांजलि सम्मिलित हुए।
ट्रेनर के रूप में मुंबई से हीना शहदादपुरी,जोधपुर से अमृता दुदिया और बिलासपुर से विनीता भावनानी थी।
हीना ने बच्चों की परवरिश के बारे में पीपीटी के माध्यम से जानकारी देकर कहा कि पेरेंट्स को बच्चों में कॉन्फिडेंस भरना चाहिए उनकी बातों को ध्यान से सुनना चाहिए। हर समय दूसरों के सामने बच्चों को पोयम सुनाओ का खिलौना नहीं बनाना चाहिए ।माता और पिता को तालमेल बनाकर चलना चाहिए तभी बच्चे का सर्वांगीण विकास संभव है।बच्चे के किसी भी निर्णय में दोनों का एक मत होना जरूरी है।
अमृता ने अपने ट्रेनिंग सेशन में कहा कि शिक्षा के साथ संस्कार होना बहुत जरूरी है। संस्कार विहीन शिक्षा एटम बम बन सकती है ‌।उन्होंने अपने संबोधन में रीति रिवाज और त्योहारों को परिवार के साथ मनाने में जोर दिया क्योंकि इससे परिवार में एनर्जी के वाइब्रेशन आते हैं ।उन्होंने यह भी कहा कि अपने बच्चों को पॉजिटिव वाइब्रेशन देकर उनकी समस्या को हल करने में मदद करना चाहिए। विनीता भावनानी जी ने कहा कि परिवार में तीन बातें पॉइजन का काम करती है बहस, तुलना और अपेक्षाएं। परिवार में जो बेटी बहू बनकरआती है तो परिवार को प्रेम,प्यार,विश्वास, समर्पण और सम्मान से पहले बहू का दिल जीतना चाहिए तभी वह उसे अपना घर समझेगी,बहू को भी अपने ससुराल में रिश्तो में मधुरता और सामंजस्य बनाना चाहिए।
राष्ट्रीय अध्यक्ष सीए चेतन तारवानी जी ने कहा कि सुनने की कला से आप किसी के जीवन में खास बन सकते हैं। संस्था की संस्थापक मनीषा तारवानी ने कहा कि बच्चों की पहली शिक्षक मां होती है उसी को सुसंस्कृत करने के लिए यह सम्मेलन आयोजित किया क्योंकि बहुओं के माध्यम से ही आने वाली पीढ़ी में संस्कार हस्तांतरित होंगे।
राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके ने सिंधी समाज के इस सम्मेलन में खुशी जाहिर करते हुए कहा कि यह समाज की महिलाओं की उन्नति के लिए एक बेहतरीन प्रयास है‌। उन्होंने कहा कि भारत में शादी दो परिवारों का मिलन होती है इसमें हर रिश्ते में समर्पण की भावना होना जरूरी है आजकल परिवार में शादी के बाद जो समस्याएं होती है वह संस्कारों की कमी के कारण ही पैदा होती है उन्होंने आह्वान किया कि अगर बच्चों को पहले से ही संस्कार दिए जाएं तो भविष्य में रिश्ते टूटने से बच सकते हैं।
सम्मेलन में पूज्य संत साईं श्री युधिष्ठिर लाल जी, साईं लाल दास जी, भाभी मां दीपिका जी और वृंदावन से आई मानस पुत्री पुष्पांजलि ने अपने आशीर्वचन से अभिभूत किया और उन्होंने सभी को परिवारों में पढ़ाई के साथ-साथ बच्चों को शुरू से ही अपनी भाषा और संस्कार ,रीति रिवाज को  मानने के लिए जोर दिया।
कार्यक्रम में रायपुर सहित प्रदेश के विभिन्न शहरों से लगभग हजार लोग उपस्थित थे। सुहिणी सोच संस्था को सहयोग करने वाली 12 संस्थाओं को एवं आयोजकों को मोमेंटो देकर उनका सम्मान किया गया । कार्यक्रम का मंच संचालन जूही दरयानी और नीलिमा आहूजा सरिता आहूजा एवं साक्षी मखीजा ने किया, अध्यक्ष पायल जसवानी ने सभी अतिथियों का सम्मान किया।अंत में सचिव माही बुलानी ने सबका धन्यवाद ज्ञापन किया।
प्रेस विज्ञप्ति मीडिया प्रभारी ज्योति बुधवानी के द्वारा जारी की गई।

Saturday, October 2, 2021