ग्रामीण इलाकों में तब प्राइवेट स्कूल का चलन भी नहीं था। चौथी क्लास से पांचवीं में जाने पर किसी दिन तय होता था कि आज पांचवीं की पुस्तक आएगी। पापा के बाजार जाने के बाद उनके आने की बेशब्री से प्रतीक्षा रहती थी। दूर से ही उनके हाथ पर नजर रहती थी। भारी पैकेट देखकर अंदाजा हो जाता था कि किताब ही है ये। फिर खुशी से उस पैकेट को खोलना, किताबों के पन्ने को बार बार सुंघना, उस पर अखबार का जिल्द लगाना.....
तब अधिकतर लकड़ी या स्टोव पर ही खाना बनता था। कालोनी में एक दो जगह पर एल पी जी गैस आ जाने पर मम्मी का बार बार रुठना और पापा से झगड़ा करना फिर पापा का आजिज आकर गैस चुल्हा खरीदना। जिस दिन आना था उस दिन सारा दिन इंतजार करना फिर गैस चुल्हा आने पर पहले उस पर खीर बनना......
संबंधियों में किसी के विवाह में शामिल होने के आमंत्रण से मम्मी पापा का संभावित खर्चे को लेकर गंभीर और चींतीत होना फिर सबों के लिए कपड़ा खरीदने के लिए पापा का बाजार निकल पड़ना। हमलोगो द्वारा इतरा इतरा कर कालोनी के दोस्तों को बताना कि फलां तारिख को हमलोगो फुफा के यहां शादी में जा रहे हैं और हमलोगो का बस और ट्रेन के सफर के बारे में सोच सोच कर रोमांचित होना.....
लगता है पिछले जन्म की बात हो....यकीन नहीं होता कि वो सुनहरा पर हमने इसी जीवन में जिया है। आज लाखों की आमदनी, कार, बड़ा घर लेकिन जीवन में वो वाला जायका नहीं।


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