जिसने भी ये कहावत बनाई होगी वो या तो पूरी तरह से स्वार्थी इंसान रहा होगा जो 'अपने' 'पूत' के बाहर जाकर कुछ देख ही नहीं पाया होगा, तो उसकी कोई बेटी नहीं होगी, उसकी बीवी नहीं होगी, उसके माँ बाप भाई बहन कोई नहीं रहे होंगे। या तो वो निहायती आलसी और कामचोर आदमी रहा होगा और काम से बचने के लिए उसने ये मुहावरा बना दिया होगा।
पहले ये स्पष्ट समझिये कि आखिर सपूत होता क्या है, और कपूत किसे मानते हैं? जो अच्छी आदतो वाला है जो माँ बाप का फरमाबरदार है उनकी सेवा और मदद करता है, नाम रोशन करता है वो सपूत है और जो ये करने में असफल हो जाता है वो कपूत है। लेकिन पूत सपूत है या कपूत ये तो प्रमाणों की एक श्रृंखला के बाद ही सिद्ध होगा। पूत एकाध बार दारू पीकर आ गया, चोरी छुपे सिगरेट पी लेता है, लड़की के चक्कर मे कहीं उलझ गया, काम काज कुछ नहीं जम पाया तो क्या उसे सारी ज़िन्दगी के लिए कपूत सिद्ध कर दिया जाए?
पूत जब सपूत निकलता है तो आप श्रेय लेते हैं आखिर संस्कार किसके हैं, आखिर खून किसका है? तो जब आपका पूत कपूत निकलता है तो आप ये क्यों कहते हैं कि पता नहीं कहाँ से संस्कार बिगड़ गए? पता नहीं किस जन्म का पाप कट रहा है हमारा ? ये आपके दोगलेपन की निशानी है।
एक बात अच्छे से याद रखिये, आपकी संतान आपकी ज़िम्मेदारी है, उसके प्रति जागरूक रहिये, बचपन से लेकर अपनी मृत्यु होने तक। उसका सही रारीक़े से पालन पोषण कीजिये। उसे होशियार बनाइये। उसे एक आदर्शों का पुतला नहीं बल्कि एक अनुकूलन करने योग्य इंसान बनाइये। उसके गुणों का श्रेय लेने वालों उसके दोषों को भी स्वीकार कीजिये और उसे कभी अपने प्रेम, अपनी सहायता अपने भरोसे से वंचित मत कीजिये।
आप याद रखिये आपका सक्षम कपूत हमेशा आपके अक्षम सपूत पर भारी पड़ेगा। इसलिए अपने सपूत को सक्षम बनाइये हर तरीके से। अगर आप पैसा कमाने और संचित करने में अक्षम हैं तो इस कहावत का लाभ मत उठाइये।
जब तक आप अपने पूत के साथ हैं उसे कोई कपूत नहीं बना सकता। उसके साथ समय बिताइए। उसकी बातों को सुनिये। उससे बातें कीजिये। उसकी शंकाओं को दूर कीजिये। उसे शारीरिक रूप से सबल मानसिक रूप से प्रबल और चारित्रिक रूप से निष्ठावान बनने में मदद कीजिये।
पूत को दें कि नहीं दें ये बाद की बात है पहले आप संचित तो कीजिये। कुछ जोड़ के कुछ बचा के दिखाइए। अपने पूत पर सम्यक निवेश तो कीजिये। सोचिये उसकी कितनी इच्छाओं का गला आपने घोंटा है अपनी अक्षमताओं के चलते? उसे कितना नीचा दिखाया है अपनी धारणाओं के चलते? एक परीक्षक एक समीक्षक की बजाए कभी उसे सिर्फ उसके पिता के रूप में देखा आपने ? उसकी हर बात पर आप एक मार्किंग सिस्टम लिये बैठे रहे ये तय करने कि वो सपूत है या कपूत? उसकी अद्वितीयता को उसके अनूठेपन को उसकी वैयक्तिकता को कभी समझने की कोशिश की आपने?
माफ कीजिये जनाब जिसे आप कपूत समझ रहे हैं वो एक बेहतरीन दोस्त है किसी का जो हर आड़े वक़्त में उसके काम आता है वो एक निष्ठावान प्रेमी है जिसने आंख उठा कर भी किसी दूसरी लड़की को नहीं देखा। वो अपने काम मे ईमानदार है, वो अपने सांसारिक मसलों से अपने दम पर जूझता है। वो आपकी अपेक्षा के अनुरूप अपना कैरियर नहीं बना पाया और आपको समाज मे ये बताने का मौका नही मिला कि 'मेरा' बेटा फलां फलां पोस्ट पर है। उसने हर महीने अपनी आमदनी का अधिकांश भाग चुपचाप माँ के हाथ पर धर दिया। उसने आपको घूर कर नहीं देखा। उसने आपसे ज़िद करना बचपन से ही छोड़ दिया था क्योंकि वो एक कहावत जानता था, पितर असमरथ कैसी आसा पितर समरथ कैसी आसा!!
पूत को सिर्फ पूत मानिए। अगर वो सपूत निकला तो आप सुपिता होंगे यदि वो कपूत निकला तो आप भी कुपिता होंगे।
@ मन्यु आत्रेय


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