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Wednesday, December 15, 2021

विवेकानन्द जी

एक बार एक साधु जैसे दिखने वाले सज्जन रेल से कहीं सफ़र कर रहे थे | जिस डिब्बे में वे सफर कर रहे थे, उसी डिब्बे में कुछ अंग्रेज यात्री भी थे |

उन अंग्रेजो को साधुओं से बहुत चिढ़ थी | वे साधुओं की लगातार ख़ूब निंदा कर रहे थे | साथ वाले साधु यात्री को भी गाली दे रहे थे | उन अंग्रेजों की सोच थी कि चूँकि साधू अंग्रेजी नहीं जानते, इसलिए उन अंग्रेजों की बातों को नहीं समझ रहे होंगे | इसलिए उन अंग्रेजो ने आपसी बातचीत में साधुओं को कई बार भला बुरा कहा |

हालांकि उन दिनों की हकीकत भी यही थी कि अंग्रेजी जानने वाले साधु होते भी नहीं थे |

रास्ते में एक बड़ा स्टेशन आया | उस स्टेशन पर उन सज्जन के स्वागत में हजारों लोग उपस्थित थे, जिनमे विद्वान् एवं कुछ बड़े अधिकारी भी थे |

वहाँ उपस्थित लोगों को सम्बोधित करने के बाद अंग्रेजी में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर वे सज्जन फर्राटेदार अंग्रेजी में ही दे रहे थे |

 इतनी अच्छी अंग्रेजी बोलते देखकर उन अंग्रेज यात्रियों को सांप सूंघ गया जो रेल में अबतक उनकी बुराई कर रहे थे |

अवसर मिलने पर वे उन सज्जन के पास आए और उनसे नम्रतापूर्वक पूछा – आपने हम लोगों की बात सुनी, आपने बहुत बुरा माना होगा ?

वे सज्जन बहुत ही सहज शालीनता से बोले....” मेरा मस्तिष्क अपने ही कार्यों में इतना अधिक व्यस्त था कि मैंने आप लोगों की बातें बिलकुल सुनी ही नहीं औऱ न ही उन पर ध्यान दे सका ,इसलिए मुझें बुरा मानने का अवसर ही नहीं मिला..... |” 

उन सज्जन का यह जवाब सुनकर अंग्रेजो का सिर शर्म से झुक गया और वे उनके चरणों में गिर पड़े......वे सज्जन कोई औऱ नहीं बल्कि स्वामी विवेकानंद जी थे.....!!

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